नेपाल त्रासदी पूरे हिमालय क्षेत्र की साझा चेतावनी है – ज्ञानेन्द्र रावत

“त्रासदियों और चेतावनी के बावजूद सबक सीखने को तैयार नहीं हम”
लेखक : ज्ञानेन्द्र रावत
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।
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बीती 26 सितंबर की अल-सुबह तिब्बत सीमा से लगे नेपाल के रसुबा जिले में आये सैलाब के तांडव की चपेट से जहां रसुवा, धादिंग, नुवाकोट, गोरखा, तनहुं, नवरपासी और चितवन समेत तमाम निचले इलाकों के हजारों घर, दफ्तर, बाजार का अस्तित्व ही मिट गया और सड़कों का अता-पता नहीं है। करोडों-अरबों के आर्थिक नुकसान का अनुमान है। अभीतक लगभग 1127 से ज्यादा लोगों की मौत हुयी है जिनमें 800 से ज्यादा के शव मिल चुके हैं जिनकी पहचान प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। वहीं अपनों की पहचान हेतु डी एन ए जांच हेतु परिजन सड़क मार्ग अवरुद्ध होने, सभी जगह पानी, कीचड़ और मलवा होने की वजह से जाने में असमर्थ हैं। 4858 से ज्यादा की तादाद में लोग लापता हैं जिनके परिजन इतने दिन बाद भी उनके जिंदा लौटने की आस लगाये बैठे हैं। 583 विदेशी पर्यटक अभी भी लापता हैं जबकि 315 पर्यटक बचा लिए गये हैं। अभी तक 756 से ज्यादा लोगों को राहत व बचाव दल द्वारा बचा लिया गया है। 290 मानसरोवर जाने वाले तीर्थ यात्रियों की तलाश जारी है। दर्जनों शवों का पानी के साथ बहकर निचले मैदानी इलाकों में पहुंचना जारी है। वहीं नेपाल के सीमावर्ती जिलों खासकर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश की नदियों में सैलाब का मलबा, रसायन युक्त अपशिष्ट और मरी हुयी मछलियों के आने से नदी जल के दूषित होने और जलजीवों के अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है।

नेपाल में आए सैलाब का मंजर
हालात की भयावहता का आलम यह है कि नेपाल में अस्पतालों में शवों के रखने की जगह कम पड़ने के बाद शवों को बाहर टैंटों में रखना पड़ रहा है। इस प्रलंयकारी सैलाब और ग्लेशियर ढहने से आई बाढ़ से नेपाल की भोटेकोशी और त्रिशूली घाटियों में स्थित 14 पनबिजली परियोजनाएं पूरी तरह तबाह हो गयी हैं, परियोजनाओं की सुरंगों में फंसे लोगों का अभीतक कोई सुराग नहीं लग सका है। बेनीघाट स्थित कृष्ण भीर नदी के प्रवाह ने सड़क काटकर 30 मीटर का गड्ढा कर दिया है जिससे यातायात बंद हो गया। सड़क बंद होने से काठमांडु- मुग्लिम मार्ग पर काठमांडु , पोखरा, चितवन और सौनोली मार्ग के दोनों तरफ मीलों लम्बा जाम लग गया। अंतत: नारायणगढ़ में आवागमन रोकना पड़ा। नेपाल, चीन और भारत के हजारों राहतकर्मी बचाव कार्य में लगे हैं। नदी के तेज बहाव से राहत कार्य में बाधा आई है। फिर भी दुर्गम हालात में बचाव कर्मियों के साहस की जितनी प्रशंसा की जाये वह कम है। इस दौरान नेपाल की हेलीकॉप्टर पायलट कैप्टन प्रिया अधिकारी के साहस और वीरता को नमन जिन्होंने भीषण भयावह परिस्थिति में सैकड़ों उड़ान के जरिये सैलाब में फंसे सैकड़ों लोगों को बचाया।
जहांतक नेपाल की त्रासदी का सवाल है, यह कैसे आयी इस बाबत अलग-अलग वैज्ञानिक दृष्टिकोण सामने आये हैं। सच्चाई तो यह भी है कि न तो उसस वक्त नेपाल में तेज बारिश हुयी, न मौसम ही खराब था लेकिन इस जलजले ने वहां सब कुछ तबाह कर दिया। कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि हिमस्खलन ने तिब्बत के केरूंग इलाके में लेंडे नदी को अवरुद्ध कर दिया। नतीजतन नदी में झील का निर्माण हुआ और भारी मात्रा में उसमें पानी जमा हो गया। जब यह हिमनद फटा तो भोटेकोशी और त्रिशूली नदी में बाढ़ आ गयी। दूसरी ओर भूवैज्ञानिक मानते हैं कि गोसाई कुंडा से 47 किलोमीटर उत्तर में तिब्बती इलाके में उस दिन सुबह 8.37 बजे 4.4 तीव्रता का भूकंप आया। इसी की वजह से नदी में बनी झील का बांध टूट गया। इस दृष्टिकोण को नेपाल के विदेश मंत्री भी स्वीकारते हैं। कुछ इसके पीछे ग्लेशियर झील के फटने, कुछ बर्फ के पिघलने से या हिमस्खलन से अचानक नदी में बाढ़ आने, कुछ की राय में तिब्बत के पठारी इलाके में भारी बारिश आने से नदी के जलस्तर बढ़ने से आयी बाढ़ आने और कुछ रसुवा जिले में 17 हजार फीट की ऊंचाई पर ग्लेशियर के फटने और उसके हिस्से टूटकर गिरने और अपने साथ मलबा बहाकर लाने को इस जल प्रलय की असली वजह मामते हैं। बहरहाल इस सबके बावजूद नेपाल को इस त्रासदी से उबरने में सालों लग जायेंगे लेकिन इस सैलाब में अपनी जान गंवाने वालों के परिजनों को इस हादसे का गम ताजिंदगी सालता रहेगा।

नेपाल के रसुवा जिले में बाढ़ का मंजर
इसमें दो राय नहीं कि समूचा हिमालयी क्षेत्र गंभीर पारिस्थितिकी संकट से जूझ रहा है। सच तो यह है कि पारिस्थितिकी और पर्यावरणीय परिस्थितिजन्य स्थितियों से जुड़े संकट का मौजूदा हालात में केवल नेपाल ही नहीं, समूचा हिमालयी क्षेत्र सामना कर रहा है। हालात गवाह हैं कि आज समूचा हिमालयी क्षेत्र बेहद गंभीर आक्रामक दौर से गुजर रहा है। यह टिप्पणी बीते दिनों हमारे देश की सुप्रीम कोर्ट ने भी की है।

त्रिशूली नदी किनारे बाढ़ की चपेट में पूरा इलाका
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.आर.गबई और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने यह टिप्पणी हिमालयी राज्यों में अभूतपूर्व बाढ और भूस्खलन का जिक्र करते हुये की थी कि बड़ी संख्या में हमने लकड़ी के गट्ठे पानी में बहते हुये देखे हैं। इससे ऐसा लगता है कि पहाड़ों पर बड़ी संख्या में पेड़ों की अवैध कटाई हुयी है जिसके फलस्वरूप ये आपदायें आयीं हैं। यह पहाड़ों पर विकास और पर्यावरण के बीच असंतुलन का दुष्परिणाम है। यह गंभीर मामला है। विकास को राहत उपायों के साथ संतुलित किये जाने की बेहद जरूरत है। मानव ने प्रकृति में इतना अधिक हस्तक्षेप किया है जिसका प्रकृति अब हमें जबाव दे रही है।
देखा जाये तो हिमालयी इलाकों में मानसून के दौरान अधिकाधिक प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ता है। ये अपनी जटिल बनावट, नाजुक हालात और लगातार बदलती जलवायु परिस्थितियों की वजह से विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं जैसे भूस्खलन, बाढ, भूकंप, बादल फटने और ग्लेशियर पिघलने की वजह से आने वाली बाढ़ के प्रति काफी संवेदनशील होते हैं। ये आपदायें आबादी क्षेत्र, बुनियादी ढांचों और जैव विविधता के लिए गंभीर खतरा पैदा करती हैं। इस हिमालयी क्षेत्र में आपदाओं की हिस्सेदारी करीब 44 फीसदी है। हकीकत यह है कि 1902 से लेकर अब तक इस क्षेत्र में दर्ज 240 आपदाओं में 132 से ज्यादा बाढ़ से सम्बंधित, 37 भूस्खलन की, 23 तूफानों की, 17 भूकंप की और 20 से ज्यादा चरम तापमान की दर्ज हुयीं हैं लेकिन इस बार तो इस हिमालयी क्षेत्र में कुदरत ने तबाही के नये कीर्तिमान स्थापित किये हैं।

नुवाकोट जिले में बाढ़ के बाद मलबे से पटे घर
असलियत में अभी तक पहाड़ी इलाकों में ही बादल फटने और भूस्खलन जैसी घटनायें घटती रही हैं। लेकिन मौसम के बदलाव ने इस बाबत चिंतायें और बढ़ा दी हैं। दरअसल हिमालय के हादसे बता रहे हैं कि हिमालय क्षेत्र में सब ठीक नहीं चल रहा है। मौसमी बदलाव और इस हिमालयी इलाके में विकास के नाम पर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, बढती आबादी और विकास परियोजनाओं की भी इसमें बहुत बड़ी भूमिका है। इस विनाश में दुर्लभ प्रजातियों का तो अस्तित्व ही मिटा दिया गया है।
सबसे बड़ी चिंता तो मौसम को लेकर है क्योंकि मौसम में आ रहा बदलाव मानवता के समक्ष अबतक की सबसे बड़ी चुनौती है। इससे निपटने में देरी या नाकामी भविष्य के लिए बेहद खतरनाक है। यह खतरा केवल हिमालयी क्षेत्र को ही नहीं है, हकीकत में यह समूचे विश्व के लिए खतरनाक चुनौती है जिसका मुकाबला भी दुनियां के देशों को मिलकर करना होगा। फिर पर्यावरण में हो रहे बदलाव बेहद चुनौती भरे और गंभीर हैं जिसके दुष्परिणाम सभी को भुगतने होंगे। क्योंकि ये बदलाव धरती के अस्तित्व के लिए बहुत बड़ा खतरा बन चुके हैं। आई सी जे तो काफी पहले इसकी चेतावनी दे चुका है। फिर मानसून मौसम विज्ञानियों को जहां गच्चा दे रहा है, वहीं मानसून की अनिश्चितता ने बारिश की तीव्रता को काफी हदतक बढा दिया है। फिर बादल फटने, अचानक बाढ़ और भूस्खलन की घटनाओं में बढ़ोतरी ने यह संकेत तो दे ही दिया है कि मौसमी बारिश से यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि बादल फटने या अचानक बाढ़ की घटनायें नहीं होंगी। हिमालयी क्षेत्र तो आज भी भूस्खलन और बादल फटने की घटनाओं से आये-दिन दो-चार हो रहा है। फिर जलवायु परिवर्तन ने तो सब कुछ बिगाड़ कर रख दिया है। इससे जहां जल चक्र असंतुलित हो रहा है,वहीं बेसिन या तो सूख रहे हैं या जरूरत से ज्यादा भरे हैं। जलवायु परिवर्तन के चलते आपदा की इस तरह की घटनाओं के बढ़ने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता। कारण जलवायु परिवर्तन के लिहाज से हिमालयी क्षेत्र काफी संवेदनशील है जिससे आने वाले समय में आपदाओं के बढ़ने का खतरा बना रहेगा। फिर अस्थिर ग्लेशियर और ग्लेशियर झीलों की बढ़ती तादाद से बाढ़ की विकरालता का खतरा दिनोंदिन लगातार बढ़ता जा रहा है। इसमे दो राय नहीं कि यह झीलें भूस्खलन, भूकंप, भारी वर्षा या हिम स्खलन के कारण अचानक विनाशकारी बाढ़ के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार हैं।
एक खतरा और है, वह यह कि हिंदूकुश पर्वतमाला के ग्लेशियर भयावह रूप से तेजी से पिघल रहे हैं। नतीजतन इस इलाके की नदियां अपनी धाराएं बदल रही हैं। इन हालातों में ये सब ‘क्रायोस्फेरिक टाइम बम’ बन गये हैं। ये मुख्यत: पर्माफ्रास्ट के तेजी से पिघलने के चलते बनते हैं जो कार्बन डाई आक्साइड और मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसों के रूपांतरण में संग्रहित कार्बन उत्सर्जन करते हैं जो वैश्विक तापमान बढ़ोतरी में तेजी लाता है। हिंदूकुश पर्वत को एशिया की जल मीनार और तीसरा ध्रुव भी कहा जाता है। इस महत्वपूर्ण क्षेत्र की अनदेखी समझ से परे है।

नवसारी में बाढ़ से तबाह बाजार
ऐसे समय जब समूची दुनिया बढ़ते तापमान के कहर से त्रस्त है और जब इस इलाके में मौसमी विभीषिका विकराल रूप ले रही हैं, तब ये आपदायें इस क्षेत्र में तमाम खतरों की संवेदनशीलता की ओर संकेत करती हैं और हिमालय की नाजुक ढलान, घाटियों में मानवीय तथा निर्माण गतिविधियों के प्रति सावधान करती हैं। नेपाल में जिस तरह कुदरत का कहर बरपा है, उससे न सिर्फ शासन तंत्र को, बल्कि नागरिक समाज को भी सबक लेने की जरूरत है। और यह भी कि हिमालयी अंचल में विकास योजनाओं के निर्माण के समय क्या-क्या सावधानियां बरती जानी चाहिए।
सबसे बड़ी बात यह कि नेपाल की यह त्रासदी महज प्राकृतिक आपदा नहीं है, सच तो यह है कि यह उस हिमालय की चेतावनी है जिसे हम हमेशा से अडिग मानते आये हैं जबकि वह भीतर ही भीतर बदल रहा है। हमारी समझ में कभी भी हिमालय का पारिस्थितिकीय विज्ञान नहीं आया। यही सबसे बड़ी हमारी भूल रही है। यही भूल हमें ऐसी आपदा की स्थिति का सामना करने को विवश कर देती है।हमारी जिद ही हमें इस इलाके में मैदानी क्षेत्र की तरह विकास करने की ओर ले जाती है। यही वजह है कि यह पर्वत श्रृंखला जो हमारे लिए ही नहीं, समूचे क्षेत्र के लिए वरदान है, हमारा साथ छोड़ रही है। बीते दशक की आपदायें चेतावनी हैं जिन्हें समझना और उनपर अमल बेहद जरूरी है।हिमालय बदल रहा है, यहां ग्लेशियर झीलों के रूप में आ रहे लगातार बदलाव से इस अंचल में आपदा की आशंका सदैव बनी रहती है ही। इसलिए अभी भी समय है कि सभी हिमालयी देशों को इसके मूल चरित्र को समझते हुए इसके संरक्षण हेतु आगे आना होगा। जाहिर है ऐसे हालात में इस अति संवेदनशील इलाके में एक साझी पर्यावरणीय दृष्टि विकसित करने, भारत, चीन, नेपाल, भूटान और तिब्बत क्षेत्र के बीच वैज्ञानिक संस्थाओं और आपदा प्रबंधन तंत्र विकसित किये जाने की जरूरत है जो एक साथ अतिवृष्टि, भूस्खलन, ग्लेशियरों के पिघलने, ग्लेशियर झीलों के टूटने, पर्माफ्रास्ट से होने वाले नुकसान पर अंकुश लगा सके। (लेखक के अपने विचार है।)

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