मरीज से मिलने नहीं, मौत की अफ़वाह सुनाने आए हैं!

लेखिका : रेणु जैन
इंदौर (मध्य प्रदेश)
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हम भारतीय बड़े भावुक लोग हैं। किसी के घर बच्चा पैदा हो जाए तो पूरी गली मिठाई खाने पहुंच जाती है, और अगर कोई अस्पताल में भर्ती हो जाए तो उससे भी ज़्यादा उत्साह से लोग उसका हालचाल पूछने निकल पड़ते हैं। फर्क बस इतना है कि मिठाई वाले अवसर पर लोग मिठास लेकर जाते हैं, जबकि अस्पताल वाले अवसर पर अधिकांश लोग ऐसा ज़हर घोलकर लौटते हैं कि डॉक्टर की सारी दवाइयाँ मिलकर भी उसका असर खत्म नहीं कर पातीं।हमारे यहां मरीज को देखने जाना भी अपने आप में एक लोककला है। यह केवल कुशलक्षेम पूछने का कार्यक्रम नहीं होता, बल्कि दुखद संस्मरणों का अखिल भारतीय सम्मेलन होता है। जैसे ही कुर्सी खिसकाकर मरीज के पास बैठेंगे, चेहरे पर कृत्रिम सहानुभूति का रंग पोतेंगे और पहला वाक्य होगा—”अरे… यही बीमारी तो हमारे मौसा जी को भी हुई थी। शुरू-शुरू में डॉक्टर भी यही कहते रहे कि चिंता की कोई बात नहीं है…” इसके बाद कहानी जिस दिशा में जाती है, उसका अंत कभी घर वापसी पर नहीं होता। वह सीधे आईसीयू, वेंटिलेटर, ऑपरेशन थिएटर या श्मशान घाट पर जाकर ही दम लेती है।
आश्चर्य होता है कि इन लोगों की स्मृति में स्वस्थ होकर लौटे हुए एक भी आदमी का उदाहरण सुरक्षित नहीं रहता। दुनिया में लाखों लोग इलाज कराकर ठीक हुए होंगे, लेकिन इनके दिमाग की हार्ड डिस्क में केवल वही लोग सेव रहते हैं जो सबसे दुखद अंत तक पहुंचे हों। ऐसा लगता है जैसे इनकी याददाश्त का सॉफ्टवेयर केवल त्रासदियों पर ही चलता हो। यदि कोई डॉक्टर कह दे कि मरीज खतरे से बाहर है, तो इन्हें बेचैनी होने लगती है। तुरंत किसी न किसी रिश्तेदार, पड़ोसी, साले के बहनोई या चचेरे फूफा का ऐसा किस्सा निकाल लाएंगे, जिससे मरीज को यह यकीन हो जाए कि डॉक्टर झूठ बोल रहा है और असली सच्चाई इन्हीं के पास है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि अस्पताल में डॉक्टर इलाज करता है, लेकिन मुलाकाती निदान करते हैं। डॉक्टर ने पांच साल एमबीबीएस, तीन साल एमडी और जाने कितने साल का अनुभव लिया होता है, पर मरीज के सिरहाने बैठा यह स्वयंभू विशेषज्ञ व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय से पीएचडी करके आया होता है। वह डॉक्टर की दवा से ज्यादा अपने अनुभव पर भरोसा करता है। “ऑपरेशन मत कराना”, “एलोपैथी तो शरीर खराब कर देती है”, “हमारे गांव के वैद्य ने ऐसी बीमारी को तीन पुड़ियों में खत्म कर दिया था”, “एक बाबा हैं, बस उनका जल पी लो”—ये सारे वाक्य इतने आत्मविश्वास से बोले जाते हैं कि कुछ देर के लिए मरीज को भी लगता है कि अस्पताल में भर्ती होकर उसने शायद बहुत बड़ी भूल कर दी।
कुछ लोग तो बीमारी से ज्यादा अस्पताल के खर्च का पोस्टमार्टम करने लगते हैं। “कितना बिल बन गया?”, “बीमा है या नहीं?”, “इतने पैसे लगेंगे तो आदमी बीमारी से नहीं, बिल देखकर ही मर जाएगा।” मानो मरीज नहीं, अस्पताल का चार्टर्ड अकाउंटेंट बिस्तर पर लेटा हो और यदि मरीज की बीमारी थोड़ी गंभीर हो, तब तो ऐसे आगंतुकों का उत्साह देखने लायक होता है। वे धीरे से पास आकर कान में ऐसे फुसफुसाते हैं, जैसे कोई राष्ट्रीय सुरक्षा का रहस्य बता रहे हों—”देखो… बाहर से तो ठीक लग रहे हो, लेकिन यह बीमारी बहुत धोखेबाज होती है। हमारे पड़ोस वाले भी ऐसे ही हंस-बोल रहे थे, अगले दिन…” बस, उसके आगे शब्द नहीं बोलते, गर्दन झुका देते हैं। बाकी की फिल्म मरीज का दिमाग खुद बना लेता है।
यही कारण है कि आज की पीढ़ी अस्पताल में भर्ती होने की खबर छिपाकर रखती है। पहले लोग कहते थे—”सबको बता दो, मिलने आएंगे।” अब कहते हैं—”भगवान के लिए किसी को मत बताना।” उन्हें बीमारी से उतना डर नहीं लगता, जितना उन शुभचिंतकों से, जिनका प्रेम सीधे दिल पर नहीं, ब्लड प्रेशर पर असर करता है। डॉक्टर का इंजेक्शन एक बार चुभता है, लेकिन इनकी बातें छुट्टी मिलने के बाद भी कई दिनों तक दिमाग में घूमती रहती हैं।
मुझे तो लगता है कि अस्पतालों के प्रवेश द्वार पर सुरक्षा जांच के साथ एक और काउंटर होना चाहिए, जहां आगंतुकों से पूछा जाए—”क्या आपके पास किसी रिश्तेदार की दुखद बीमारी का किस्सा, व्हाट्सऐप से प्राप्त चिकित्सा ज्ञान, बाबा का चूर्ण, पड़ोसी की मौत का संस्मरण या डॉक्टर से ज्यादा जानकारी होने का प्रमाणपत्र है?” यदि उत्तर ‘हाँ’ हो, तो उनसे विनम्रता से कहा जाए—”क्षमा कीजिए, मरीज का स्वास्थ्य पहले ही खराब है। कृपया आप बाहर ही स्वस्थ समाज की सेवा कीजिए।”
आखिर मरीज अस्पताल में इलाज कराने जाता है, भय का प्रशिक्षण लेने नहीं। बीमारी आधी दवा से और आधी हौसले से ठीक होती है। लेकिन हमारे कुछ शुभचिंतक ऐसे हैं, जो हर मुलाकात में हौसला बाहर जूते के साथ उतारकर आते हैं और भीतर केवल डर, आशंका और मनहूस किस्सों का झोला लेकर प्रवेश करते हैं। फिर बड़े गर्व से कहते हैं—”हम तो हालचाल पूछने आए थे।”सच तो यह है कि यदि ऐसे हालचाल पूछने वाले रोज आते रहें, तो मरीज को डॉक्टर से कम और आगंतुकों से ज्यादा सुरक्षा की आवश्यकता पड़ जाएगी। (लेखिका के अपने विचार हैं)

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