
लेखक : ज्ञानेन्द्र रावत
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।
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देश की राजधानी जिसे एक समय दिल वालों की दिल्ली कहा जाता था, और तो और जिसे मशहूर शायर जौक ने कभी यमुना किनारे बैठकर ‘स्वर्ग’ की संज्ञा दी थी, बढ़ती हुयी समस्याओं के कारण नरक बनती जा रही है। यह सही है कि इसने अनेक साम्राज्यों का उत्थान – पतन, ज्ञान, संपदा के अनेक शिखर और गर्त देखे हैं और जो अपनी संस्कृति और सभ्यता के लिए जानी जाती थी, आज वह अनेकानेक समस्याओं, जैसे बढती आबादी, प्रदूषण, बदहाली, भीड़, जल संकट और जाम आदि से जूझ रही है। बीते दिनों यहां दो घटनायें घटित हुयीं। एक दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस के पास सत्य निकेतन में लड़कों के लिए पी जी सुविधा वाली पांच मंजिला इमारत गिरने से सात छात्रों की मौत और बारह लोग घायल हुए और दूसरी विगत दिनों तिलक नगर दिल्ली में दिल्ली सरकार के पीडब्ल्यूडी विभाग द्वारा हाल-फिलहाल बनी सड़क की गुणवत्ता पर आप विधायक जरनैल सिंह द्वारा सवाल उठाये जाने पर मौके पर पहुंचे दिल्ली के पीडब्ल्यूडी मंत्री प्रवेश वर्मा द्वारा वहां वीडियो बना रहे एक युवक को थप्पड़ मार देने जैसे व्यव्स्था गत मुद्दे पर उठा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। पहले विवाद पर देश की सुप्रीम अदालत की टिप्पणी राजधानी दिल्ली की व्यवस्था पर सीधे सवाल खड़े करती है। अदालत की टिप्पणी दिल्ली के रिहायशी इलाकों की बदहाली को उजागर करती है। अदालत ने सत्य निकेतन मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि ‘ दिल्ली के रिहायशी इलाकों का बुरा हाल है। हालत यह है कि यहां बच्चे खेल नहीं सकते और बुजुर्ग टहल नहीं सकते। जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि वे उन्हें एक ही कमरे में सैकड़ों की संख्या में ठूंस देते हैं जैसे सार्डिंन मछली को एक डिब्बे में भरा जाता है। क्या वह ढांचा इतना भार सहने लायक है? वहां न तो अंदर-बाहर जाने का कोई ठीक इंतजाम है, न ही कुछ और।’ उन्होंने दिल्ली सरकार, नगर निगम और भवन निर्माण विभाग द्वारा नियमों व जमीन के इस्तेमाल से जुड़े नियमों के उल्लंघन और पिछले आदेशों के अनुपालन न किये जाने पर चिंता जाहिर करते हुए रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया।
दूसरा मामला सीधे-सीधे सड़क निर्माण में कथित घोटाले का है जिसे मंत्री के साथ अभद्रता व अपमान के साथ जोड़कर तथा आप विधायक द्वारा विकास कार्य में रुकावट डालने का आरोप लगाकर सड़क निर्माण में घपले -घोटाले को छिपाने के प्रयास की कोशिश की जा रही है। वहीं इसे विपक्षी दलों द्वारा भाजपा पर घपले-घोटाले पर पर्दा डालने और सड़क की खराब स्थिति को लेकर सवाल पूछ रहे आम नागरिक के साथ कथित तौर पर थप्पड़ मारने की घटना की तीव्र भर्तस्ना व मंत्री की हरकत का जबाव लोकतान्त्रिक तरीके से देने की चेतावनी दी जा रही है। सच तो यह है कि दोनों घटनायें व्यवस्थागत लापरवाही और घपले-घोटाले की जीती-जागती मिसाल हैं। इनमें एक जहां जमीन के इस्तेमाल की मंजूरी, स्ट्रक्चरल सुरक्षा में आग से सुरक्षा निर्देशों के पालन, मंजूर किये गये बिल्डिंग प्लान ,असल में निर्माण व मंजिलों की संख्या, बेसमेंट व उसके अंदर हुये बदलाव व आने-जाने के रास्तों और खतरनाक व जर्जर स्थिति की समय-समय पर जांच किये जाने में अनियमितता व लापरवाही बरते जाने को दर्शाती है, वहीं दूसरी घटना तो भ्रष्टाचार की जीती-जागती मिसाल है।

सरकारें विकास के दावे-दर-दावे करती नहीं थकतीं लेकिन हालात उसके बिल्कुल उलट हैं। अब जरा सुविधाओं पर नजर डालें, दिल्ली दुनिया के सबसे सघन आबादी वाले महानगरों में शुमार हो चुकी है और देश में वह बेतरतीब फैल रहे शहरों में पांचवें स्थान पर है जिसका मुख्य कारण शहरी विकास में गुणवत्तापूर्ण डाटा की कमी और उसका सही उपयोग न होना है। फिर बीते 25 सालों में राजधानी दिल्ली में हुए अनियोजित और अनियंत्रित विकास ने सबसे बड़ा नुकसान पर्यावरण का किया है जिसके चलते प्रदूषण से दिल्ली हांफ रही है। शहर का पारिस्थितिकीय तंत्र इसका ज्वलंत प्रमाण है। हकीकत में यमुना के बाढ़ क्षेत्र से लेकर घनी आबादी वाले इलाकों तक विकास की कीमत यहां के लोगों को प्रदूषण के रूप में चुकानी पड़ रही है। इसके तहत जहां रिवर फ्रंट और पुल निर्माण से जलीय जैव विविधता को सबसे अधिक नुकसान हुआ है, वहीं लैंडफिल विस्तार और अपशिष्ट प्रबंधन से मिट्टी और भूजल प्रदूषण उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है और हवा में पी एम 10 का स्तर 4 से 5 गुणा तक बढ़ गया है। एक ओर इससे यमुना की वाटर रिचार्ज क्षमता में गिरावट आई है, वहीं लैंडफिल साइटों के आसपास रहने वाले लोगों में त्वचा, श्वांस, हृदय और फेफड़े संबंधी रोगों का खतरा दिनोंदिन बढ़ रहा है। हालात न सुधरे तो यहां हर पांच सैकेंड में एक जान जायेगी। आर्गनाइजेशन फार इकोनॉमिक कार्पोरेशन एण्ड डवलपमेंट के अध्ययन ने यह चेतावनी दी है। दिल्ली हाईकोर्ट तो 11 साल पहले ही चेतावनी दे चुका है कि यहां रहना गैस चैम्बर में रहने जैसा है।
दरअसल आबादी की रफ्तार के मुकाबिले शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और पेयजल जैसी सुविधाओं के मामले में यह काफी पीछे है और वह जाम से भरी सड़कों, अनियंत्रित फैलाव और खराब होती हवा की गुणवत्ता जैसी समस्याओ से भारी दबाव में है। बीते 15 सालों के दौरान यहां की आबादी ने 37 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ 2.30 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया है। इस दौरान दिल्ली में रोजगार और शिक्षा के लिए दिल्ली से बाहर के राज्यों से होने वाले विस्थापन से आबादी में बढ़ोतरी हुई है। पहले यहां कुल 9 जिले थे जो अब बढ़कर 13 हो चुके हैं। 15 साल पहले यहां कुल 91 अस्पताल थे जो अब 92 हो गये हैं। जहांतक पेयजल का सवाल है, 4.200 किलोमीटर लम्बी पाइपलाइन तो बिछी और 93 फीसदी घरों तक पानी पहुंचाने का दावा किया जा रहा है जबकि हकीकत में इस दौरान पेय जलापूर्ति केवल 848 एमजीडी से 1,000 एमजीडी ही हो पाई है। स्वच्छ पेयजल की बात छोड़ भी दें तो भी नगर निगम से मिलने वाला साधारण पानी भी दिल्ली की प्यास बुझाने के लिए कम पड़ता है। बाहरी दिल्ली के लोग तो टैंकरों के भरोसे अपनी पानी की जरूरत पूरी करते हैं।

यूनिवर्सिटी 8 से बढ़कर 17 और कालेज 78 से 90 तो हो गये लेकिन प्रोफेशनल एजूकेशन के कालेजों की तादाद 106 से घटकर कुल 91 रह गयी है। मेट्रो नेटवर्क बढ़कर 187 किलोमीटर से बढ़कर 374 किलोमीटर हो गया लेकिन डीटीसी का बेड़ा 5,892 से बढ़कर मात्र 6,100 ही हुआ यानी इस दौरान केवल 208 बसें ही बढ़ पायीं। यहां चार दशकों में वाहनों की तादाद में 21 गुणे से भी ज्यादा की बढ़ोतरी हुयी लेकिन सड़कों में सिर्फ दोगुणी ही बढ़ोतरी हुयी। साल 2000 के बाद से वाहनों की तादाद में 158 फीसदी की बढ़ोतरी हुयी जबकि सड़कों के जाल में केवल 39 फीसदी की ही बढ़ोतरी हुयी। यातायात पुलिस का अध्ययन इसका जीता-जागता सबूत है। अध्ययन के मुताबिक यहां प्रति वर्ग किलोमीटर 371 से अधिक वाहन हैं जबकि सड़कों पर क्षमता से तीन गुणा अधिक वाहन दौड़ रहे हैं। वाहनों की तादाद बढ़ने से हादसों में बढ़ोतरी और अधिक इस्तेमाल होने से सड़कें भी जल्दी खराब हो रही हैं। जाहिर है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल और परिवहन जैसी सुविधाएं आबादी के बोझ तले हांफ रही हैं।
जहां तक दिल्ली में छांव का सवाल है, चीन और जर्मनी के विश्व विद्यालयों के शोध में इसका खुलासा हुआ है कि दिल्ली में 73 फीसदी से अधिक आबादी के पास पर्याप्त छांव नहीं है। भीषण गर्मी में राजधानी के लोगों को छांव की कमी और ज्यादा झुलसाती है। दिल्ली में छांव का वितरण इतना असमान है कि बड़ी आबादी को तेज धूप और विकिरण वाली गर्मी का सामना करना पड़ता है। शोध के मुताबिक दिल्ली में सड़क किनारे पेड़ों की छत्रछाया इतनी नहीं है कि पैदल चलने वालों को लगातार सुरक्षा मिल सके। उस दशा में लोगों को गर्मी का जोखिम बना रहेगा। यहां सरकारी लापरवाही कहें या भ्रष्टाचार का आलम यह है कि यहां कंक्रीट से धधकती दिल्ली को राहत पहुंचाने और हरियाली बढ़ाने के नाम पर करोड़ों रुपए का घोटाला हुआ। यहां सड़क किनारे 23 लाख 82 हजार झाड़ियां सहित पेड़ों को लगाने के लिए करोड़ों खर्च करने का दावा किया गया लेकिन वे कहां लगे, कितने बचे या कितने मर गये, इसका हिसाब पीडब्ल्यूडी के पास है ही नहीं। और पेड़ लगाने के बाद उनका सरवाइवल रेट जानने हेतु आडिट भी नहीं हुआ। इससे जाहिर होता है कि दिल्ली कागजों पर हरी -भरी है जबकि हकीकत में जमीन पर झाड़ियां भी मौजूद नहीं हैं।

इस स्थिति से निपटने के लिए दिल्ली सरकार योजनायें तो बना रही है और उन पर काम भी कर रही है। केन्द्र सरकार भी उसे योजनाओं के क्रियान्वयन हेतु हरसंभव मदद कर रही है। वह बात दीगर है कि उनपर अमल किस सीमा तक होता है या वह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं। बहरहाल वर्तमान में हम जिस अस्थिर और भ्रष्ट राजनैतिक धरातल पर खड़े हैं, उस दौर में हम संविधान को कहांतक आत्मसात कर पाये हैं, मौजूदा हालात में इस व्यवस्था के प्रति जबावदेह होती परिपक्व पीढ़ी के सामने यह सबसे बड़ी चुनौती है। यह भी सच है कि इस दौर में तंत्र से सवाल पूछना अपराध है? यदि ऐसा है तो हम किस गणतंत्र में रह रहे हैं। यह विचार का विषय है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब देश की राजधानी की यह हालत है, तो देश की हालत क्या होगी? सच यह है कि इस दम तोड़ती व्यवस्था के लिए तथाकथित राजनेता ही जिम्मेदार नहीं हैं। यह जिम्मेदारी उन पर भी आती है जो अपने मतों के जरिये ऐसे जनप्रतिनिधियों के हाथों में सत्ता की चाबी सौंपते हैं। इसलिए हमें इस पर भी गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए। यह समय की मांग है। (लेखक के अपने विचार हैं)