
लेखक : ज्ञानेन्द्र रावत
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।
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आज प्रदूषण एक भयावह समस्या का रूप ले चुका है। सरकार दावे भले कितने ही करे,असलियत तो यह है कि इस बाबत सारे सरकारी प्रयास नाकाम साबित हुए हैं और जनता जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर है। जहां तक मुझे याद आता है आज से तकरीब चौदह-पंद्रह साल पहले की बात है, एक अमेरिकी पत्रकार ने अपने विदाई संदेश में लिखा था कि – ‘वह दिल्ली इसलिए छोड़कर जा रहा है कि अमेरिकी दूतावास में प्रदूषण जांचने वाली मशीन बता रही है कि यहां उसके बच्चे की सेहत को खतरा है।’ उस वक्त यह कहा गया था कि अमेरिकी दूतावास समस्या को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है। लेकिन कुछ समय बाद जब दिल्ली में सरकारी प्रदूषण जांच केन्द्र स्थापित किये गये, तब उन्होंने भी इस बात की पुष्टि की कि समस्या वाकई गंभीर है। उस समय कहा गया था कि यहां की आबोहवा में हद से भी अधिक पी एम 2.5 की मौजूदगी से न सिर्फ बच्चे समय पूर्व अस्थमा के शिकार हो सकते हैं, बल्कि गर्भवती महिलाएं ऐसे बच्चों को जन्म दे सकती हैं,जो तमाम तरह की स्वास्थ्य समस्याओं के साथ-साथ कम वजन के शिकार होंगे। पी एम 2.5 के ऐसे सूक्ष्म कण तो बुजुर्गों के लिए बेहद घातक हो सकते हैं। असलियत में तकरीब 14 – 15 साल बाद आज देश की राजधानी के हालात वास्तव में न सिर्फ उससे भी ज्यादा खराब हैं बल्कि बेहद भयावह हैं। हालात की गंभीरता का सबूत यह है कि पिछले कुछ सालों से डाक्टर दिल्ली के लोगों को सर्दियों के इन महीनों में दिल्ली से बाहर पहाड़ी इलाकों में जाने की सलाह देते हैं ताकि यहां की जहरीली हवा से उनकी जान बच सके।

आज दिल्ली के 20 से अधिक या यूं कहें कि अधिकांश इलाकों की हवा अब बेहद खराब श्रेणी में पहुंच चुकी है। हकीकत यह है कि वायु गुणवत्ता सूचकांक 454 का आंकड़ा पार कर चुका है। आने वाले दिनों में हवा और ज्यादा प्रदूषित होने के आसार हैं। फिल्हाल राहत की कोई उम्मीद नजर नहीं आती। इस हकीकत को झुठलाया नहीं जा सकता। सीपीसीबी इसकी पुष्टि करता है। कि प्रदूषण में सर्वाधिक 17.93 फीसदी हिस्सेदारी वाहनों की है जबकि पराली का योगदान 15.60 फीसदी है। हालात की भयावहता का सबूत यह है कि अस्पतालों में सांस सम्बंधी बीमारियों के मरीजों की तादाद दिनोंदिन तेजी से बढ़ती जा रही है। राम मनोहर लोहिया अस्पताल के पल्मोनरी डिपार्टमेंट के प्रमुख डा० दीपक की मानें तो उनमें बुजुर्ग और बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा है। और तो और डाक्टर घरों के दरवाजे बंद रखने, अगरवत्ती, धूपवत्ती न जलाने और झाड़ू न लगाने के साथ बुजुर्गों को घरों के अंदर ही रहने की सलाह दे रहे हैं। जबकि केन्द्र सरकार ने वायु प्रदूषण से निपटने के लिए राष्ट्रीय स्वच्छ हवा कार्यक्रम, एनसीएपी लागू किया था जिसमें अभीतक मामूली सफलता ही हाथ लगी है। राज्य और नगर निगम एनसीएपी के तहत मिले फंड का 70 फीसदी हिस्सा ही खर्च कर पाये हैं। उसमें भी सरकार ने बजटीय आवंटन का अधिकांश हिस्सा स्थायी सुधारों जैसे सार्वजनिक परिवहन के बजाय केवल सड़कों पर पानी छिड़कने व मैकेनाइज्ड स्वीपिंग जैसी तात्कालिक गतिविधियों पर ही खर्च किया है। अब सरकार दावा कर रही है कि प्रदूषण पर वार के लिए ‘वार रूम’ तैयार है जिसके तहत प्रदूषण की निगरानी व्यवस्था बढ़ायी जायेगी और प्रदूषण की रियल टाइम मानीटरिंग और उस पर तत्काल कार्रवाई की जा सकेगी। जबकि हकीकत में अभीतक कहीं-कहीं न तो वायु गुणवत्ता मापक यंत्र ही लग पाये हैं और न ही कहीं-कहीं वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशन ही लगे हैं। उस स्थिति में जबकि सर्दियां आते ही उत्तर भारत में हवा खराब होने लगती है। गिरता तापमान और रुकी हुयी हवायें जहरीले धुंए को जमीन के पास रोक लेती हैं जिससे दिल्ली और आसपास के मैदानी इलाकों में एक दम घोंटने वाली धुंध छा जाती है जिससे लोग परेशान होते हैं और उनके लिए सांस लेना भी दूभर हो जाता है। फिर इसमें बीते 25 सालों में दिल्ली में हुए बेतरतीब विकास ने पारिस्थितिकी को बड़ी क्षति पहुंचायी है जिसकी कीमत प्रदूषण के रूप में जनता को चुकानी पड़ रही है। नतीजतन प्रदूषण से दिल्ली हांफ रही है। हकीकत में देश की राजधानी दिल्ली का बेतरतीब फैल रहे भारत के शहरों में पांचवां स्थान है जिसका अहम कारण कमजोर योजना, बिखरा प्रशासन, असमान सेवाओं के चलते उत्पादकता और जीवन गुणवत्ता का बुरी तरह प्रभावित होना है। यहां पिछले 15 सालों में आबादी 37.5 फीसदी की दर से बढ़कर 2.30 करोड़ के पास पहुंच गयी है लेकिन आबादी के हिसाब से यहां सुविधायें आज भी अधूरी हैं। आंकड़े इसके जीते-जागते सबूत हैं।

जैसीकि 14-15 बरस पहले अमरीकी पत्रकार ने प्रदूषण की बाबत टिप्पणी की थी और इसके कारण वह देश छोड़ने को विवश हुआ था, आज हालात उससे भी ज्यादा भयावह हैं। यदि यूं कहें कि हालात तब से सौ गुणा से भी ज्यादा खराब हो चुके हैं, तो कुछ गलत नहीं होगा। इस बाबत वह चाहे आई आई टी दिल्ली हो, यूनिवर्सिटी आफ लंदन का इंपीरियल कालेज हो या किंग्स कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय का पर्यावरण अध्ययन विभाग हो, प्रख्यात हृदय रोग विशेषज्ञ डा० नरेश त्रेहन हों, बर्मिंघम यूनिवर्सिटी हो, सऊदी अरब के किंग खालिद हास्पिटल एण्ड रिसर्च सेंटर हो, ब्रिटेन की क्वींस यूनिवर्सिटी बेलफास्ट हो, डब्ल्यू एच ओ हो या फिर आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी हो, 34 देशों के संगठन आर्गनाइजेशन फार इकोनॉमिक कार्पोरेशन एण्ड डवलपमेंट हो या फिर कनाडा की मैकमास्टर यूनिवर्सिटी ओटिरियो हो आदि-आदि संगठनों, संस्थानों और वैज्ञानिकों द्वारा समय-समय पर किये गये शोधों ने प्रदूषण से मानव स्वास्थ्य पर होने वाले दुष्परिणामों का सिलसिलेवार खुलासा किया है। शोधों के अनुसार वायु प्रदूषण गर्भ में पल रहे बच्चे की सेहत पर भी असर डाल रहा है। प्रदूषण की वजह से मां के पेट में भ्रूण का विकास प्रभावित हो रहा है, नतीजतन कम वजन के बच्चे पैदा हो रहे हैं। इससे उनका कद भी घट रहा है। इसका सबसे ज्यादा असर बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ रहा है। यही नहीं वायु प्रदूषण बच्चों के फेफड़ों, उनकी बुद्धिमत्ता, याददाश्त, सीखने की क्षमता और एकाग्रता पर भी असर डाल रहा है। बिगड़ती हवा से बच्चों में सांस की बीमारी 10 साल पहले की तुलना में 47 फीसदी बढ़ गयी है। हवा में मौजूद सूक्ष्म कण यानी पी एम 2.5 कम उम्र में ही आंखों में मोतियाबिन्द और ग्लूकोमा यानी काला मोतिया का कारण बन रहा है। सबसे दुखदायी तो यह है कि वायु प्रदूषण के संपर्क से आत्महत्या या आत्मघाती विचारों का खतरा बढ़ जाता है।
वायु प्रदूषण से इंसानी फेफड़े बेदम हो रहे हैं। यह हमारे दिमाग की धार को कुंद कर रहा है। जहांतक दिल्ली वालों का सवाल है, उनके तो फेफड़े काले हो रहे हैं। और तो और यह रक्त वाहिकाओं पर भी असर डाल रहा है। यह दिल के मर्ज को जानलेवा बना रहा है। यह दिल के लिए मधुमेह और कोलेस्ट्राल से भी घातक साबित हो रहा है। अब इसका असर हृदय, फेफडो़ं, सांस, त्वचा, दमा, पाचन तंत्र, मस्तिष्क से जुड़े रोगों को ही प्रभावित नहीं कर रहा, हड्डियों, श्वसन व प्रजनन तंत्र से भी काफी आगे बढ़ गया है। यह शरीर के हरेक अंग को प्रभावित कर रहा है। यह कैंसर और मैटाबोलिक विकार को भी पार कर गया है। इससे डिमेंशिया का खतरा बढ़ गया है। यही नहीं उच्च वायु प्रदूषण और गंदी हवा में रहने वाले बच्चों के आई क्यू स्कोर में मौजूद प्रदूषक तत्व बच्चों के शैक्षणिक प्रदर्शन, उनकी सोचने-समझने की क्षमता और व्यवहार पर भी बुरा असर डाल रहे हैं। यह स्थिति अवसाद और चिंता के जोखिम को और बढ़ा देती है। वायु प्रदूषण अब कम उम्र में आंखों की रोशनी छीन रहा है। यातायात सम्बंधी प्रदूषण इन समस्याओं को बढ़ाने में अहम भूमिका निबाह रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार पी एम कण इतने सूक्ष्म हैं कि वे शरीर के माध्यम से सीधे मस्तिष्क में पहुंच कर दिमाग में आक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन पैदा कर रहे हैं। सबसे दुखदायी स्थिति यह है कि 15 साल से कम उम्र के 2.02 करोड़ बच्चे इस प्रदूषण के शिकार हैं।

हकीकत है कि वायु प्रदूषण से हर साल तकरीबन बीस लाख से ज्यादा लोग मौत के मुंह में चले जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार आज 93 फीसदी बच्चे प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। भारत में सभी श्वसन संबंधी मौतों में से एक तिहाई से अधिक वायु गुणवत्ता से जुड़ी हैं। वायु प्रदूषण से जुड़ी होने वाली ज्यादातर स्वास्थ्य समस्यायें एयरोसोल से जुड़ी होती हैं जिसके कण मानव आंखों को मुश्किल से दिखाई देते हैं जो जलवायु, मौसम और शरीर में विषाक्तता सम्बंधी प्रतिक्रियाओं को जन्म देते हैं। इसके लम्बे समय तक संपर्क में रहने से फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। अत्याधिक सांद्रता के कारण श्वसन तंत्र अवरुद्ध होने से मृत्यु तक हो सकती है। इसके प्रभाव से जानवर और पौधे भी अछूते नहीं रह सके हैं। इसके अलावा स्ट्रोक से होने वाली लगभग 40 फीसदी मौतों के लिए वायु प्रदूषण जिम्मेदार है। इस बाबत सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत व न्यायमूर्ति जायमाल्या बागची की आला पीठ ने सही ही कहा है कि वायु प्रदूषण अब एक गंभीर समस्या का रूप ले चुका है। अब इसके फौरी निदान के बजाय दीर्घ- कालिक उपाय ढूंढना जरूरी हो गया है। (लेखक के अपने विचार है।)