
लेखक: ज्ञानेन्द्र रावत
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।
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दुनिया में तेजी से हो रहे तापमान में बदलाव से सेहत की लय बिगड़ती जा रही है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन की ताजा रिपोर्ट में बदलते मौसम की वजह से तापमान में होने वाले बदलावों को लेकर कई तरह की चिंतायें जाहिर की हैं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार दुनिया में तापमान में तेजी से बढ़ोतरी के दुष्परिणाम स्वरूप आर्कटिक क्षेत्र में वार्मिंग बाकी दुनिया की तुलना में 3.5 गुणा तेजी से बढ़ रही है, कारण अब यहां बर्फ कम ही बची है। 2026 से 2030 के बीच मई से सितम्बर महीनों के दौरान साहेल यानी अफ्रीका, उत्तरी योरोप, अलास्का और साइबेरिया में बारिश के पैटर्न बदलने के कारण सामान्य से अधिक बारिश की संभावना को नकारा नहीं जा सकता। अमेजन क्षेत्र को और अधिक गर्म और असामान्य रूप से शुष्क हालातों से दो-चार होना पड़ेगा। सबसे बड़ी बात कि तापमान में मामूली बढ़ोतरी भी जीव-जंतुओं की सेहत की बर्बादी का कारण बनेगा। दरअसल तापमान में बढ़ोतरी का दबाव प्रजातियां, प्रबाल भित्तियां सहन नहीं कर पायेंगी और अंतत: उनका खात्मा होना शुरू हो जायेगा।
सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि वैज्ञानिकों ने कार्बन डाई आक्साइड में हुयी रिकॉर्ड बढ़त और उसके चलते तापमान में होती लगातार बढ़ोतरी से दुनिया में हीटवेव की आशंका व्यक्त की है।हीटबेव की स्थिति तो मानव शरीर के लिए वैसे ही अत्याधिक खतरनाक होती है। इसकी चपेट में बच्चे, 60 से ज्यादा उम्र के बुजुर्ग, विशेष रूप से महिलाएं, फेफडो़ं की पुरानी बीमारी वाले, निर्माण और श्रम से जुड़े लोग ज्यादातर आते हैं। इन लोगों पर खतरा सबसे ज्यादा रहता है। फिर पहले से ही स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है। इससे डिहाइड्रेशन, हीटस्ट्रोक और मौत भी हो सकती है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन की मानें तो 2027 तक पूरी दुनिया में रिकार्ड तोड़ गर्मी की आशंका है। गर्मी के मौसम में तो वैसे ही संक्रामक बीमारियों का प्रकोप ज्यादा रहता है। हालिया शोध ने गर्भवती महिलाओं और शिशुओं के स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बनती भीषण गर्मी की चेतावनी ने चिंता और बढ़ा दी है। नये शोध से खुलासा हुआ है कि बढ़ती भीषण गर्मी समय पूर्व प्रसव का अहम कारण बन रही है। वैलेंसिया, बर्न सहित दुनियाभर के पांच विश्व विद्यालयों द्वारा सन 1979 से 2019 तक दुनिया के 13 देशों के 250 शहरों-कस्बों में हुये 3.66 करोड़ प्रसव का विश्लेषण से इस तथ्य की पुष्टि हुयी कि तापमान बढ़ने के साथ ही समय पूर्व प्रसव का खतरा बढ़ जाता है। यह अध्ययन साइंटिफिक जर्नल इनवायरमेंट इंटरनेशनल पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन के मुताबिक मध्यम स्तर की गर्मी में यह जोखिम 2.8 फीसदी, जबकि अत्याधिक गर्मी में यह 3.8 फीसदी तक बढ़ जाता है। निष्कर्ष यह कि हर 10 लाख जन्मों पर लगभग 855 अतिरिक्त समय पूर्व प्रसव उच्च तापमान के कारण हो सकते हैं। अध्ययन के मुताबिक 37 से 38 सप्ताह की गर्भावस्था में प्रसव का जोखिम 3.66 फीसदी और 39 सप्ताह या उससे अधिक की गर्भावस्था में यह जोखिम 2.97फीसदी बढ़ सकता है।दरअसल अधिक गर्मी से शरीर पर अत्याधिक दबाव बढता है जिससे गर्भाशय में खिंचाव शुरू हो सकता है, शरीर में पानी की कमी प्रसव पीड़ा को समय पूर्व शुरू कर सकती है, गर्भपात में बच्चे तक आक्सीजन और पोषक तत्व पहुंचाने वाली प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है और बच्चे के जन्म के लिए शरीर जल्द तैयार हो सकता है जो खतरनाक साबित हो सकता है। यही नहीं बच्चे का बजन सामान्य से कम हो सकता है, फेफड़े पूरी तरह विकसित न हो पाने की स्थिति में सांस की समस्या हो सकती है और समय पूर्व जन्म लेने के कारण बच्चे को नवजात गहन चिकित्सा प्रणाली पर रखना पड़ सकता है। यही वजह है कि अध्ययन कर्ताओं ने गर्भवती महिलाओं को कड़ी धूप से बचने और पानी पीने की सलाह दी है।

इसके अलावा स्पेन के बार्सिलोना इंस्टीटयूट फार ग्लोबल हैल्थ के शोधार्थियों के अध्ययन का निष्कर्ष है कि उच्च तापमान के संपर्क में रहने के कारण गर्भावस्था और प्रारंभिक शिशु अवस्था के दौरान मस्तिष्क के सूचना संसाधन केंद्र थैलेमस की वृद्धि धीमी हो सकती है। इससे मस्तिष्क के विकास की गति स्थायी रूप से प्रभावित हो सकती है। शोध की समन्वयक प्रोफेसर मोनिका गुवसैंस का कहना है कि वैश्विक तापमान वृध्दि के कारण गर्भावस्था और प्रारंभिक शिशु अवस्था के दौरान गर्मी को कम करने के उपाय बच्चों के मानसिक विकास की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निबाह सकते हैं। उनकी मानें तो धीमी थैलेमिक वृध्दि किशोरावस्था के दौरान व्यवहार सम्बंधी लक्षणों जैसे आक्रामकता और नियमों के उल्लंघन से भी जुड़ी होती है। अब तो बढ़ती गर्मी और जलवायु परिवर्तन सिर्फ हमारे पर्यावरण को ही नहीं, हमारी रातों की नींद को भी सीधे तौर पर प्रभावित कर रही है। क्लाइमेट सेन्ट्रल द्वारा जारी ताजा रिपोर्ट ने तो सबको हैरान कर दिया है। रिपोर्ट की मानें तो दुनियाभर के 1368 और भारत के 107 शहरों के विश्लेषण से यह खुलासा हुआ है कि गर्मी के कारण लोगों की नींद में 65 से 93 घंटे की औसतन सालाना कमी आई है। बड़े शहरों में यह अनुपात छोटे शहरों के मुकाबले कहीं ज्यादा है।
गौरतलब है और दुनिया के शोध-अध्ययन इस बात के सबूत हैं कि बीते 50 सालों में बढ़ते तापमान के कारण नींद खोने की यह रफ्तार दोगुणी से भी ज्यादा हो गयी है। वैश्विक स्तर पर देखें तो पाते हैं कि लोग भीषण गर्मी के चलते साल में औसतन 56 घंटे की नींद गंवा रहे हैं। इसमें दस फीसदी हिस्सा जलवायु परिवर्तन का है। भारत में औसतन लोग जलवायु परिवर्तन के चलते आठ घंटे की नींद खो रहे हैं जबकि दक्षिणी राज्यों में यथा तमिलनाडु, कर्नाटक, केरलम,आंध्रप्रदेश, तेलंगाना में यह नुकसान 78 से 91 घंटे तक देखा गया है। पुडुचेरी में सबसे ज्यादा 92 घंटे की कमी है। इसमें 5 घंटे सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन के चलते है। देश के दक्षिणी राज्यों में 8 से 9 घंटे की नींद सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन के चलते है। रिपोर्ट के अनुसार बंगलुरू में 67 घंटे की नींद कम हुयी है जबकि पटना में 8 घंटे,अजमेर-जमशेदपुर में 7 घंटे, अहमदाबाद, रांची और भोपाल में 6 घंटे,आगरा, दिल्ली, देहरादून, गाजियाबाद, फरीदाबाद, मेरठ,कानपुर, प्रयागराज, लखनऊ में लोगों की नींद में 5 घंटे की कमी आई है। दिल्ली व गाजियाबाद के लोग गर्मी के कारण सालाना औसतन 66 घंटे की नींद गंवा रहे है। गुरुग्राम और फरीदाबाद की स्थिति और भी बुरी है। यहां के लोग औसतन 68 घटे की नींद सालाना खो रहे हैं। मेरठ के लोग हर साल औसतन 65 घंटे की नींद खो रहे हैं। इस बारे में डाक्टरों की राय है कि नींद पूरी न होने के कारण लोगों की सेहत पर काफी गंभीर परिणाम हो रहे हैं। नींद की कमी के चलते लोग दिल, उच्च रक्त चाप, मानसिक तनाव के शिकार हो रहे हैं। दिनभर थकान और सुस्ती के चलते कामकाजी लोगों की उत्पादकता और निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो रही है और उनकी रोगों से लड़ने की क्षमता पर बुरा असर पड़ रहा है। दुनियाभर में गर्मी का आलम यह है कि चीन में गर्मी की भीषण मार से बचाने हेतु बच्चों को उनके अभिभावकों ने एक अनूठा तरीका ईजाद किया है। वे पेठे से लिपटाकर अपने बच्चों को सुला रहे हैं। गौर करने वाली बात ये है कि यह कोई आलीशान साफ्ट टाप या कूलिंग गैजेट्स नहीं है बल्कि रसोई में पाया जाने वाला एक बड़ा सा विंटर मैलन यानी पेठा है। वहां गर्मी से बचने की खातिर बाकायदा माल या मंडियों से बड़े बड़े पेठे खरीदकर ला रहै हैं और बच्चों के पास रख रहे हैं। इसके पीछे शुद्ध विज्ञान है क्योंकि पेठे में लगभग 95 फीसदी पानी होता है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि आने वाले दिन और भी भयानक हो सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र और विश्व मौसम विज्ञान संगठन की चेतावनी के अनुसार अगला साल सबसे गर्म हो सकता है। उनकी ताजा रिपोर्ट सारी दुनिया के लिए खतरे की घंटी है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि वर्ष 2026 से 2030 तक के बीच के पांच सालों में वैश्विक स्तर पर गर्मी अपने सारे रिकॉर्ड तोड़ देगी। इस दौरान तापमान ऐसे खतरनाक स्तर तक पहुंच जायेगा जिसकी इंसान ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगले पांच सालों में धरती का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस की उस सुरक्षित सीमा को पार कर जायेगा जिसे पार न करने की दुनिया के देशों ने खायी थी। फिर अलनीनो मौसम तंत्र की वापसी के कारण अगला साल इतिहास का सबसे गर्म तपता साल हो सकता है। संयुक्त राष्ट्र के जलवायु प्रमुख साइमन स्टिल का कहना है कि मौजूदा स्थिति इस बात का सबूत है कि योरोप, भारत और दुनिया के अन्य हिस्सों में आज भी भारी मात्रा में कोयला, गैस और तेल का इस्तेमाल हो रहा है। इसके मानवीय और आर्थिक दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। लंदन के इंपीरियल कालेज के जलवायु वैज्ञानिक फ्रेडरिक ओटो ने चेतावनी दी है कि यदि पूरे साल या उससे अधिक समय तक तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस ऊपर रहता है तो दुनिया को ऐसे चरम मौसम का सामना करना पड़ेगा जो अबतक के अनुभव से भी अधिक गंभीर होगा। ऐसी स्थिति में जबकि देश में मानसून पर असर पड़ेगा,कई क्षेत्रों में लंबे समय तक सूखे के आसार रहने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता। हमारा देश पहले से ही 45 डिग्री तापमान वाले लंबे हीटवेव को झेल चुका है। भविष्य में हीटवेव और लंबी होगी और रात का तापमान भी ज्यादा कम नहीं होगा। ऐसी स्थिति में और सावधान रहने की जरूरत है। साथ ही सरकारों को भी स्वास्थ्य सुविधाओं पर विशेष ध्यान देना होगा। उस स्थिति में यह और भी जरूरी है जबकि संयुक्त राष्ट्र चेतावनी दे चुका है कि आने वाले सालों में साठ करोड़ लोग इसकी चपेट में होंगे और 31 से 48 करोड़ लोगों के जीवन की गुणवत्ता में कमी होगी। उस स्थिति में तो यह और भी जरूरी है जबकि जलवायु संकट से निबटने में भारत पिछड़ा है। येल यूनिवर्सिटीज की एनवायरनमेंट परफार्मेंस इंडेक्स की रिपोर्ट से इसका खुलासा हो चुका है जिसमें भारत और बांग्लादेश सबसे निचले पायदान पर हैं। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार है।)