चिपको की धरती पर हरे पेड़ों के कटान का विरोध – सुरेश भाई

लेखक : सुरेश भाई
लेखक ख्यात सामाजिक कार्यकर्ता एवं पर्यावरणविद हैं।
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उत्तराखंड एक ऐसा राज्य है जहां पेड़ों को बचाने के लिए लोग चिपको और रक्षासूत्र आंदोलन की परंपरा को आगे बढ़ाते रहते हैं। पहाड़ी क्षेत्र में हो या फिर यहां के तराई और मैदानी भूभाग जैसे देहरादून, हरिद्वार, उधम सिंह नगर, हल्द्वानी,ऋषिकेश के लोग और सामाजिक संगठन पर्यावरण संरक्षण में अह्म भूमिका निभाने वाले बृक्षों की आवाज बन जाते हैं।
आजकल ऋषिकेश- भानियावाला- देहरादून राष्ट्रीय राजमार्ग पर सात मोड वाली सड़क को चौड़ा करने के लिए अमूल्य वन प्रजाति साल और अन्य चौड़ी पत्ती के लगभग 4000 से अधिक पेड़ों के कटान के विरोध में केंद्रीय सड़क और राजमार्ग मंत्रालय के दफ्तर से लेकर जंगल तक सैकड़ों लोग सड़क पर उतरे हुए हैं। विरोध के रूप में दफ्तियां हाथों में लेकर प्रदर्शनकारियों के नारों से आसमान गूंज रहा है। लोग पेड़ों पर चिपक रहे हैं। कटान रोक रहे आंदोलनकारियों को गिरफ्तार किया जा रहा है। इसके बावजूद भी शासन- प्रशासन की ओर से अनसुनी की जा रही हैं। यहां तक कि नैनीताल हाईकोर्ट ने भी विकास के नाम पर पेड़ों के कटान को नहीं रोका है।
पहले से ही बनी हुई सात मोड वाली ऋषिकेश – देहरादून राष्ट्रीय राजमार्ग में गाड़ियों की आवाजाही के लिए पर्याप्त स्थान है लेकिन इस क्षेत्र के पर्यावरण की यह बहुत बड़ी अनदेखी है कि केवल 10-20 मिनट पहले देहरादून, दिल्ली पहुंचने के लिए यहां पर पिछले दिनों से चौड़ी पत्ती के दुर्लभ वन प्रजातियों को काटना प्रारंभ कर दिया गया है जबकि मौजूदा स्थिति ऐसी है कि जब यहां से यात्री और पर्यटक गुजरते हैं तो सघन हरे पेड़ों के बीच में हिमालय के निचले क्षेत्र की ठंडी हवा का आनंद और गर्मियों के समय में तेज गर्मी से राहत मिलती है। अनेकों यात्री इन सघन वनों की छांव में अपनी गाड़ी से उतरकर विश्राम भी करते हैं। लोग सूक्ष्म जलपान करते हुए इन वृक्षों की छांव के बीच में आनंद उठाते हैं।
चारधाम जाने वाले यात्रियों को सुखद सुकून भरी जिंदगी का अहसास यहां की हरियाली के दर्शन कर महसूस होती हैं। हिमालय के इस निचले क्षेत्र का अरावली की पहाड़ियों के साथ संगम होने से तेज गर्मी में भी ठंडी हवा के आनंद की अनुभूति और देवलोक की मनोरम प्रकृति से परिचय भी कराती है। यद्यपि ऋषिकेश से देहरादून के बीच में लगभग 40 किमी की दूरी तक हरियाली की अंधाधुंध बर्बादी सन् 2000 में राजधानी बनने के बाद से ही प्रारंभ हुई है। देहरादून ऋषिकेश के तापमान में 42 डिग्री से अधिक बढ़ोतरी के बावजूद भी योजनाकारों और नीति निर्धारकों के समझ मैं अभी तक नहीं आया है कि यहां पेड़ों को बचाकर सड़क के दोनों ओर खाली पड़े स्थान तक सड़क को चौड़ा किया जा सकता था। हो सकता है कि इस प्रक्रिया में न्यूनतम पेड़ों को ही नुकसान होगा।

उत्तराखंड में हरेला के नाम पर हर साल लाखों पेड़ रोपे जाते हैं जो कुछ महीनों के बाद आग से जलकर राख बन जाते हैं।
ध्यान देना होगा कि यहां पर बहुत पुराने पेड़ हैं जो आग लगने के बावजूद भी धरती की सेवा करते हैं और इसके नीचे वनस्पतियां स्वयं ही उग आती है।इस महत्वपूर्ण ईकोसिस्टम को बर्बाद करके जो संदेश दिया जा रहा है उसमें जलवायु संकट के प्रति बेहद उदासीनता दिखायी दे रही है। अच्छा होता कि एलिवेटेड रोड बनाकर इस क्षेत्र के प्रसिद्ध एलिफेंट कॉरिडोर में रहने वाले जीव जंतुओं को भी सुरक्षा मिलती और देश-विदेश के लोग जब यहां से गुजरते तो उन्हें देवभूमि की खूबसूरती देखने का अंदाज यहीं से होता।
लेकिन पहाड़ी राज्य की राजधानी को मैदाने के जैसे प्रदूषण युक्त शहरीकरण बनाने की दिशा में यह कदम बहुत ही निराशाजनक है।
उत्तराखंड हिमालय का अनुभव है कि यहां ऊपरी क्षेत्र इसी तरह से मिट्टी, पानी, जंगल को बुरी तरह नुकसान पहुंचाकर चौड़ी सड़कों के निर्माण के बाद भीषण बाढ़ और भूस्खलन की समस्याएं बढ़ती जा रही है। मानसून की शुरुआत से ही भूधंसाव और भूस्खलन के दो बड़े कारण इस तरह के निर्माण कार्यों से पैदा हुए हैं। हिमालय की तलहटी से लेकर उच्च हिमालय तक राजमार्ग मंत्रालय का यह आविवेकपूर्ण कार्य बहुत चिंताजनक है। उन्हें बार-बार समझाने के बावजूद भी वे यहां की स्थिति को देखकर पर्यावरण की सुरक्षा के लिए जिस तरह के निर्माण की आवश्यकता यहां है, उसमें की जा रही घोर लापरवाही के ऐसे उदाहरण सामने आ रहे हैं जहां 10-15 मिनट के जाम से निजात पाने के लिए अनेकों जंगल गायब हो गये है।
प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अनूप नौटियाल के द्वारा सूचना अधिकार में ली गई जानकारी के अनुसार पिछले 24 वर्षों में प्रतिदिन 5 हैकटेयर (250 नाली) वन भूमि का हस्तांतरण विकास के नाम पर हुआ है। जिसके चलते वनों पर बहुत संकट खड़ा हो गया है। बताया जा रहा है कि 9 नवंबर 2000 से जून 2026 तक विभिन्न विकास परियोजनाओं के लिए 46,203.76 हेक्टर वन भूमि का हस्तांतरण किया गया है। सबसे अधिक जल विद्युत के लिए 22,250.08 हैकटेयर, सड़क निर्माण में 17,070.03 हैकटेयर,खनन कार्य के लिए 9,289.81 हेक्टर, हाई वोल्टेज लाइन हेतु 456.18 हेक्टर और पेयजल योजनाओं के लिए 294.56 हेक्टेयर वन भूमि कम हुई है, जहां लाखों पेड़ काटे गये। पिछले चार वर्ष पहले 1.21 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि खेती से बाहर भी हो गई है। जबकि खेती की जमीन 10 प्रतिशत से भी कम है और वन भूमि 71 प्रतिशत में है। अतः झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड राज्य जहां वन संपदा भरपूर मात्रा में है वह विकास के नाम पर तेजी से घट रही है। यह चिंता पलायन रोकने वालों और फाइलों में इको फ्रेंडली विकास की बहस के बीच अटकी हुई व्यवस्था को विकास और पर्यावरण के बीच रचनात्मक संबंध बनाने होंगे। जिसके लिए शीघ्र ही अनियोजित वन कटान रोकना होगा। (लेखक के अपने विचार है)

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