
कारण-कार्य सिद्धान्त
लेखक : प्रोफेसर (डॉ.) सोहन राज तातेड़
पूर्व कुलपति सिंघानिया विश्वविद्यालय, राजस्थान
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कारण-कार्य सिद्धान्त भारतीय दर्शन का प्रमुख सिद्धान्त है। बिना कारण के कोई कार्य नहीं घटित होता। कारण का अर्थ है कार्य का नियत पूर्ववर्ती होना। बादल के होने पर ही वृष्टि होती है। इसमें बादल कारण है और वृष्टि कार्य। कारण और कार्य सहवर्ती होते है। जैसा आदमी बोता है वैसा ही वह काटता है। जिसने बबूल का वृक्ष बौया है वह बबूल का वृक्ष ही काटेगा। जिसने आम का वृक्ष लगाया है वह आम के फल को ही प्राप्त करेगा। जैसा कारण रहेगा वैसा ही कार्य होगा। महान् व्यक्ति वहीं बनता है जो पुरुषार्थी होता है या पूर्वजन्म में अच्छे कार्य किया है। उसको इस जन्म में पुरुषार्थ का ही परिणाम मिल रहा है। चैरासी लाख जीव योनियों के प्रति मन, वचन और काया से न तो किसी को कष्ट देना चाहिए और न ही किसी के बारे में बुरा सोचना चाहिए। बुरा सोचना और बुरा करना दूसरों को तो बाद में नुकसान करेंगे किन्तु सोचने वाले को तत्काल ही वह नुकसान करने लगते है। सोचने वाले का सिर दर्द होना, नकारात्मक विचार आना, मस्तिष्क का असंतुलित हो जाना इत्यादि क्रियाएं तत्काल ही चालु हो जाती है। इसलिए किसी के बारे में नकारात्मक विचार नहीं रखना चाहिए। कोई भी व्यक्ति अच्छे संयोग के बिना महान् व्यक्ति नहीं बन सकता। आज के युग में देखा यह जाता है कि मानव के अन्दर थोड़ी सी सफलता प्राप्त करने पर अहंकार आ जाता है। अहंकार ही सभी दुःखों का कारण है। व्यक्ति तो निमित्त मात्र होता है। कार्य के सम्पन्न होने में अनेक कारण होते है- उपादान कारण, निमित्त कारण, आदि। घट के निर्माण मंे मिट्टी उपादान कारण है और कुंभकार निमित्त कारण है। चाक, जल, दण्ड आदि अनेक सहवर्ती कारण भी घट के निर्माण में सहयोगी होते है। किन्तु अहंकार के कारण यह प्रतीत होता है कि इस कार्य को मैंने किया। यही अहंकार कर्ता भाव है। ईश्वर ने सृष्टि को बहुत सुन्दर बनाया है। सृष्टि ईश्वर की ईच्छा मात्र से ही निर्मित हो जाती है। प्रायः सभी भारतीय दर्शनों में कारण-कार्य के विषय में चिंतन किया गया है। सांख्य दर्शन कारण-कार्यवाद को सत्कार्यवाद के रूप मंे मान्यता देता है। न्यायदर्शन कारण कार्य को असत्कार्यवाद कहता है। जैन दर्शन सदसत्कार्यवाद के रूप मंे कार्य कारण सिद्धान्त को मानता है। अद्वैतवेदान्त कारण-कार्य को अनिर्वचनीय ख्यातीवाद के रूप में स्वीकार करता है। सांख्य दर्शन के सत्कार्यवादी है। प्रश्न यह है कि कार्य की सत्ता उत्पति के पूर्व कारण में रहती है या नहीं। न्यायवैशेषिक और बोद्ध दर्शन कहते है कि नहीं। यदि उत्पति के पूर्व ही कार्य की सत्ता विद्यमान थी तब उत्पन्न होने का अर्थ ही क्या रह जाता है। निमित्त कारण का प्रयोजन ही क्या रह जाता है। यदि मिट्टी में घड़ा पहले से ही मौजूद था तो फिर कुम्हार को परिश्रम करने और चाक चलाने की क्या आवश्यकता पड़ी। इसके अलावा यदि कार्य पहले ही उपादान कारण में मौजुद था तो फिर हम कारण और कार्य का भेद किसी आधार पर करते है। मिट्टी और घड़ा दोनों के लिए एक ही नाम का प्रयोग क्यों नहीं करते? मिट्टी का लोंदा ही घड़े का काम क्यों नहीं कर देता? यदि यह कहा जाये कि दोनो में आकार को लेकर भेद है तब तो यह स्वीकार करना पड़ेगा कि कार्य में कोई वस्तु ऐसी है जो कारण में नहीं थी। अर्थात् कार्य वास्तविक रूप में कारण मंे विद्यमान नहीं था। यह सिद्धान्त असत् कार्यवाद कहलाता है। सांख्यदर्शन इस सिद्धान्त को नहीं मानता। सांख्य दर्शन का मानना है कि यदि कार्य कारण में अविद्यमान रहता तो किसी भी प्रयत्न से उसका आविरभाव नहीं हो सकता। क्या बालू से तेल निकाला जा सकता है? इसका उत्तर है नही। बालू में तेल पहले से विद्यमान नहीं था इसलिए बालू से तेल नहीं निकलता। तिल को पेरने से तेल निकलता है, क्योंकि तिल में पहले से तेल मौजुद है। निमित्त कारण का काम इतना ही नहीं है कि वह उपादान कारण में अप्रत्यक्ष रूप से वर्तमान कार्य को प्रत्यक्ष कर दे। दूसरे शब्दों में कत्र्ता के व्यापार से जिस कार्य की उत्पत्ति होती है वह वस्तुतः अभिव्यक्ति मात्र है। अतः कार्य अपने उत्पत्ति के पूर्व कारण में विद्यमान रहता है। वृक्ष उत्पत्ति के पूर्व बीज में विद्यमान रहता है। कुछ सहकारी कारणों के सहयोग से उसका प्रादुर्भाव होता है। यदि वृक्ष पहले से ही बीज में विद्यमान न रहे तो सैंकड़ों प्रयत्न करने के बाद भी उसकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। एक ही वस्तु की अव्यक्त और व्यक्त अवस्थाओं को हम क्रमशः कारण और कार्य नाम दे देते है। सृष्टि की प्रत्येक घटना कारण कार्य के अनुसार ही चलती है। बिना कारण और कार्य के कोई भी घटना घटित नहीं होती। कुछ कारण तो स्पष्ट दिखाई देते है और कुछ कारण दिखाई नहीं देते। मानव इस जन्म में जो भी सुख-दुःख, इष्ट-अनिष्ट का अनुभव कर रहा है उसका कारण है पूर्वजन्म में किया हुआ पुरुषार्थ। मीमांसा दर्शन इसको अदृष्ट नाम देता है। अदृष्ट का अर्थ है जो साक्षात् दिखलायी न दे। पूर्वजन्म में जीव के कर्म को किसी ने देखा नहीं है। इस जन्म में जो सुख-दुःख का अनुभव हो रहा है इसी के आधार पर यह अनुमान किया जाता है कि पूर्वजन्म में कैसा कर्म किया गया था। कर्म तीन प्रकार के होते है- प्रारब्ध, संचित और संचीयमाण। प्रारब्ध कर्म वह कर्म है जिसे पूर्वजन्म में किया गया है और उसका परिणाम इस जन्म में प्राप्त हो रहा है। संचित कर्म वह कर्म है जो हम इस जन्म में कर चुके है। किन्तु उसका फल अभी प्राप्त नहीं हुआ है। संचीयमाण कर्म वह कर्म है जो वर्तमान जीवन में किया जा रहा है। कर्मों के आधार पर सुख-दुःख का भोग मिलता है। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)