यह जलवायु परिवर्तन नहीं, प्रशासनिक – हत्याकांड है : रामगोपाल विश्नोई

जब 100 गर्म शहरों में 95 भारत के हों, तो…
तप्त-भारत: ‘कंक्रीट-यज्ञ’ या ‘प्रकृति-द्रोह’?
लेखक : रामगोपाल विश्नोई
लेखक पर्यावरण संघर्ष समिति, बीकानेर के संयोजक और जाने-माने पर्यावरण कार्यकर्ता हैं।
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“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” – अथर्ववेद 12.1.12
भूमि मेरी माता है, मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ।
आज पुत्र ही माता के फेफड़े काटकर ‘विकास’ का ऑक्सीजन बेच रहा है। दिल्ली 43.1°C, प्रयागराज 45.2°C, बीकानेर में 5 लाख खेजड़ी पर आरा।
यह केवल “गर्मी” नहीं है, बल्कि उस पारिस्थितिकी दिवालिएपन का परिणाम है, जिसका ब्लूप्रिंट पिछले एक दशक में तैयार किया गया। जब दुनिया की 100 सबसे गर्म शहरों की सूची में 95 नाम भारत के हों, तो यह जलवायु परिवर्तन नहीं, बल्कि प्रशासनिक और कॉर्पोरेट मिलीभगत से पैदा की गई एक आपदा है।

  1. वैदिक चेतावनी – “अरण्यानि सूक्त” से “हसदेव-हत्या” तक
    ऋग्वेद 10.146 पूछता है – “अरण्यान्यरण्यान्यसौ या प्रेव नश्यसि” – हे जंगल, तू क्यों नष्ट होता है?
    उत्तर आज सड़क पर खड़ा है: जब लोग ‘सेव अरावली’, ‘सेव हिमालय’या ‘सेव हसदेव’ के लिए सड़कों पर उतरे, तो उन्हें विकास-विरोधी बताकर चुप करा दिया गया।
    हसदेव का सच: छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य में हज़ारों पेड़ केवल इसलिए काटे गए ताकि विशिष्ट बिजनेस घरानों के कोयला ब्लॉकों का रास्ता साफ हो। यह “देश की ज़रूरत” नहीं, बल्कि “कॉर्पोरेट की तिजोरी” भरने का खेल था।
    अरावली का विनाश: दिल्ली-NCR का प्राकृतिक बफर ‘अरावली’ आज अवैध खनन और अनियंत्रित निर्माण की भेंट चढ़ चुका है। नतीजा? झुलसा देने वाली लू और ज़हरीली हवा।
    गुरु जाम्भोजी ने वेद का सार 29 नियमों में दिया – “हरा वृक्ष न काटो, सिर साटे रूंख रहे तो भी सस्तो जाण।”
    5 लाख खेजड़ी काटना वेदों और गुरुओं की शिक्षाओं के खिलाफ द्रोह है।
  2. प्रशासनिक अधर्म – ‘विश्वगुरु’ मॉडल या ‘विनाशगुरु’?
    वेद का ‘ऋत’ = प्रकृति का संतुलन। आज का ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ = ‘अनृत’।
    पिछले कुछ वर्षों में पर्यावरण प्रभाव आकलन EIA के नियमों को जिस तरह शिथिल किया गया, वह आत्मघाती है।
    जवाबदेही: जब CAG 54,282 करोड़ के बेहिसाब खर्च पर सवाल उठाता है, तो हमें यह भी पूछना चाहिए कि पर्यावरण के नाम पर वसूले गए ‘ग्रीन सेस’ का क्या हुआ?
    एक सर्वे के मुताबिक– 100 करोड़ के पौधे कागज पर लगे, जमीन पर 246 में से 215 साइट खाली।
    पॉलिसी विफलता: नीति-निर्माता चीन की तरह ‘रियल रिसोर्सेज’ – तेल रिज़र्व, फॉरेस्ट कवर – को सुरक्षित करने के बजाय रेटिंग एजेंसियों और बिल्डिंग लॉबी को खुश करने में लगे हैं।
    तैत्तिरीय उपनिषद कहता है – “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते” – जिससे जीवन पैदा हुआ, उसे मारोगे तो मृत्यु निश्चित है।
  3. सामाजिक शोषण – ‘EMI पर घर, 43°C में कफन’
    मजदूरों की दिहाड़ी 2017 से फ्रीज है, घर की बचत खत्म हो रही है और मध्यम वर्ग कर्ज के बोझ तले दबा है।
    ऐसे में एक व्यक्ति के लिए ‘क्लाइमेट चेंज’ विलासिता का मुद्दा बन जाता है, क्योंकि उसकी पूरी ऊर्जा केवल जिंदा रहने के संघर्ष में खर्च हो रही है।
    सत्ता इसी लाचारी का फायदा उठाती है और धार्मिक उन्माद व झूठी रैलियों के पीछे असली मुद्दों को दफन कर देती है।
    सैंकड़ों किसानों ने सोलर कंपनियों के अत्याचार से अपनी इहलीला समाप्त कर ली।
    *ये ‘विकास-यज्ञ’ नहीं, ‘नर-मेध’ है। मनुस्मृति 8.246 कहती है – “वनस्पतीनां हिंसा न कार्या”। मनुष्य की हत्या के बराबर सजा का प्रावधान।
  4. राजनीतिक सच – “कंक्रीट का कफन” क्यों नहीं बनता मुद्दा?
  5. कॉर्पोरेट फंडिंग: जंगल काटने वाली कंपनियां ही राजनीतिक दलों की सबसे बड़ी चंदादाता हैं।
  6. इमोशनल नैरेटिव: जब तक जनता को ‘धार्मिक गौरव’ और ‘VVIP काफिलों’ की चकाचौंध में उलझाया जा सकता है, तब तक उसे ‘साँस लेने लायक हवा’ की कमी महसूस नहीं होने दी जाएगी।
    मसूरी के मलबे से लेकर झारखंड के कटते जंगलों तक, कहानी एक ही है – “लूट की खुली छूट”।
    अगर आज भारत ‘नॉन-लिवेबल’ बन रहा है, तो इसकी सीधी जवाबदेही उस ‘पॉलिसी सर्कल’ पर है जिसने पर्यावरण को ‘अड़चन’ और कॉर्पोरेट मुनाफे को ‘विकास’ मान लिया।
  7. वैज्ञानिक गवाही – 1877 से 2026 तक
    1877 के अकाल में मद्रास प्रेसिडेंसी में लाशें सड़ रही थीं। कारण? जंगल कटे, तालाब सूखे, अल-नीनो आया। NOAA कहता है 4% आबादी मरी।*
    आज 2026: IMD येलो अलर्ट, UV इंडेक्स 11, 75% आबादी हीटवेव में। जनसंख्या तब 25 करोड़, अब 140 करोड़।
    खेजड़ी 1 पेड़ = 4°C कम। 5 लाख पेड़ = 4.8 लाख डिग्री शीतलता। ये पेड़ नहीं, ‘थार के AC’ हैं। काटोगे तो 1877 रिपीट।
  8. वैदिक समाधान – ‘लिवेबल एनवायरनमेंट’ संवैधानिक अधिकार
    क्या अब समय नहीं आ गया कि ‘लिविंग वेज’ की तरह ‘लिवेबल एनवायरनमेंट’ को भी संवैधानिक अधिकार माना जाए?
  9. अनुच्छेद 21 में जोड़ो – Right to Shade, Right to Clean Air, Right to 25°C Livable Cities.
  10. हीटवेव = राष्ट्रीय आपदा। आपदा में पेड़ कटाई = देशद्रोह + NDMA एक्ट का उल्लंघन।
  11. NGT में ‘पृथ्वी-सूक्त’ बेस बनाओ – “यस्यां वृक्षा वानस्पत्याः ध्रुवास्तिष्ठन्ति विश्वहा”।
    संघर्ष समिति से अंतिम ऐलान:*
    “यजुर्वेद 36.17 कहता है – द्यौः शान्तिः पृथिवी शान्तिः।
    शान्ति चाहिए तो 5 लाख खेजड़ी बचाओ।
    कलेक्टर साब, ये वेद का आदेश है, कंक्रीट का टेंडर नहीं।
    43°C का अलर्ट कागज का नहीं, 1877 वाले कफन का है।”
    उमाहो –
    “सर्वे भवन्तु सुखिनः” तभी होगा जब “सर्वे वृक्षाः जीवन्तु”।
    100 में 95 शहर तप रहे हैं। 100वां नंबर बीकानेर का मत बनाओ।
    *खेजड़ी बचेगी तो साँस बचेगी, साँस बचेगी ।
    (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)

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