युद्ध, महत्वाकांक्षा,अहंकार और जलवायु संकट : प्रकृति की पुकार – डा. संजय राणा

लेखक : डा. संजय राणा

लेखक जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरणविद एवं एस्रो के निदेशक हैं।
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वर्तमान समय में मानव इतिहास के एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ एक ओर पृथ्वी का भविष्य मानव की समझदारी और संवेदनशीलता पर निर्भर करता दिखाई देता है, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक अहंकार, महत्वाकांक्षा, युद्ध और संसाधनों पर विजय की होड़ भविष्य को संकट में डाल रही है। एक तरफ दुनिया भर में करोड़ों लोग प्रकृति संरक्षण के लिए छोटे- छोटे “गिलहरी प्रयास” कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ सत्ता के गलियारों में लिए जाने वाले निर्णय प्रकृति के संतुलन को गहराई से प्रभावित कर रहे हैं।
आज पर्यावरण के प्रति जागरूक नागरिक भूमि, जल, वायु और गगन के बढ़ते प्रदूषण को लेकर चिंतित हैं जिसके उपचार के लिए कोई नदी को स्वच्छ और सदानीरा बनाने के लिए अपना जीवन समर्पित कर रहा है। कोई सूखते और मरते तालाबों को पुनर्जीवित करने में लगा है। जबकि असंख्य लोग वृक्षारोपण अभियानों के माध्यम से धरती को हरा-भरा बनाने का प्रयास कर रहे हैं।
कुछ लोग गांव-गांव, शहर-शहर, विद्यालयों और कॉलेजों में जाकर युवा पीढ़ी को प्रकृति संस्कार के मध्य से संवेदनशील बना रहे हैं। तो कुछ लोग हिमालय को बचाने हेतु आर्टिफिशियल बर्फ के पहाड़ बना रहे हैं। कोई हिमालय के क्षेत्रों में पानी बोओ अभियान चला रहा है, जिससे हिमालयी क्षेत्र में पुनः जल संरक्षित हो सके और झरने जीवित हो सकें। कोई विकास के नाम पर हिमालय में कट रहे देवदार के पेडों को बचाने की मुहिम में जुटा है।
इन सब प्रयासों में न कोई बड़ा पद है, न बड़ी सत्ता, परंतु इनके भीतर पृथ्वी के प्रति गहरी जिम्मेदारी की भावना है। किन्तु इसी समय दुनिया का एक वीभत्स चेहरा भी सामने आता है। आज विश्व के अनेक देशों में छोटे-बड़े लगभग 46 सशस्त्र संघर्ष चल रहे हैं और 60 से अधिक देश प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इन तनावों और युद्धों में उलझे हुए हैं। युद्ध केवल मानव जीवन की हानि ही नहीं करता, वह पर्यावरण के लिए भी अत्यंत विनाशकारी होता हैं। आधुनिक युद्धों में प्रयुक्त मिसाइलें, बम, टैंक, लड़ाकू विमान और सैन्य वाहनों से उत्पन्न कार्बन डाई आक्साइड किसी भी बड़े औद्योगिक क्षेत्र से कम नहीं होता। एक अनुमान के अनुसार युद्ध के दौरान छोड़े गए बम और मिसाइलें कुछ ही समय में उतना कार्बन उत्सर्जन कर देते हैं जितना लाखों करोड़ों वाहनों से अनेक वर्षों में होता है। विस्फोटों से उत्पन्न धुआँ, रासायनिक अवशेष, जलता ईंधन और नष्ट होती वनस्पति न केवल स्थानीय पर्यावरण को ही नहीं बल्कि वैश्विक जलवायु को भी प्रभावित करता हैं। युद्ध क्षेत्रों में मिट्टी की उर्वरता नष्ट हो जाती है, जल स्रोत प्रदूषित हो जाते हैं और जैव विविधता को गहरा नुकसान पहुँचता है।
गौरतलब है कि प्रतिदिन 25000 से 30000 हेक्टेयर जमीन से लगभग 4.1 करोड़ पेड़ विकास के नाम पर या अन्य प्रयोजनों से काट दिए जाते है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि छद्म विकास के नाम पर और युद्धों की राजनीति में जलवायु परिवर्तन का मुद्दा अक्सर पीछे छूट जाता है। जबकि पृथ्वी हमें लगातार चेतावनी दे रही है।
हिमालय सहित दुनिया भर के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। समुद्र का स्तर धीरे-धीरे बढ़ रहा है।
मौसम चक्र असंतुलित हो रहा है—कहीं अत्यधिक वर्षा, कहीं लंबे सूखे, कहीं असामान्य गर्मी तो कहीं अप्रत्याशित ठंड देखने को मिल रही है। जंगलों में लगने वाली भीषण आग, बाढ़ और चक्रवातों की बढ़ती तीव्रता इस संकट की स्पष्ट संकेतक हैं।
ऐसे समय में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या विश्व के शक्तिशाली देशों के शासकों को यह संकट दिखाई नहीं देता? क्या उन्हें पिघलते ग्लेशियरों का खतरा नहीं दिखता? क्या बदलते मौसम और बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं के संकेत उनके लिए पर्याप्त नहीं हैं?
या फिर सत्ता की हनक, संसाधनों पर अधिपत्य और भू-राजनीतिक प्रभुत्व की होड़ इतनी तीव्र हो चुकी है कि पृथ्वी का भविष्य भी उसके सामने गौण हो गया है?
मानव सभ्यता का अस्तित्व किसी एक देश, एक शक्ति या एक विचारधारा पर निर्भर नहीं है; यह पृथ्वी के संतुलन पर निर्भर है। यदि जलवायु असंतुलन बढ़ता गया तो उसका प्रभाव सीमाओं के भीतर नहीं रुकेगा। नदियाँ, हवा, समुद्र और पर्यावरण किसी पासपोर्ट को नहीं पहचानते। जलवायु संकट अंततः पूरे मानव समुदाय को प्रभावित करेगा—चाहे वह गरीब देश हो या समृद्ध। इसलिए आज आवश्यकता केवल पर्यावरणीय जागरूकता की नहीं, बल्कि वैश्विक नैतिक नेतृत्व की है। दुनिया के नीति-निर्माताओं को यह समझना होगा कि युद्ध और हथियारों की दौड़ से न तो स्थायी सुरक्षा मिल सकती है और न ही छद्म विकास से समृद्धि। वास्तविक सुरक्षा प्रकृति के संसाधनों के संरक्षण, शांति और सहयोग में है। यदि सामान्य नागरिक अपने छोटे-छोटे प्रयासों से नदियों, तालाबों को बचाने, पेड़ लगाने और पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए आगे आ सकते हैं, तो विश्व के नेताओं से भी अपेक्षा की जाती है कि वे अपने अहंकार और प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठकर पृथ्वी के भविष्य को प्राथमिकता दें। क्योंकि यदि प्रकृति असंतुलित हो गई तो न सत्ता बचेगी, न सीमाएँ, न सभ्यता।
अंततः प्रश्न यही है—क्या मानव समय रहते चेत पायेगा? या फिर इतिहास हमें उस पीढ़ी के रूप में याद करेगा जिसने चेतावनियाँ तो सुनीं, पर उन्हें गंभीरता से नहीं लिया। पृथ्वी अभी भी हमें अवसर दे रही है। निर्णय अब मानव के हाथ में है—विनाश का मार्ग चुनना है या संरक्षण और सहअस्तित्व का। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)

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