
लेखक : सुरेश भाई
लेखक जाने-माने पर्यावरणविद एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं।
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बाढ़, भूस्खलन,भूकंप के लिए अति संवेदनशील हिमालय को भूवैज्ञानिकों ने जोन 4 और 5 में रखा है। इसके बावजूद भी क्लीन एनर्जी के नाम पर सुरंग आधारित परियोजनाओं को महत्व दिया जा रहा है। जबकि वैश्विक स्तर पर क्लीन एनर्जी के दावे अस्थाई साबित हो रहे हैं।
इस नाम पर जो निर्माण हो रहा है वह प्रकृति में अचंभित करने वाला विनाशकारी बदलाव ला रहा है। दूसरी ओर नदियों और जल स्रोतों के पुनर्जीवन और संतुलन के दावे भी कमजोर हैं। पहाड़ों की नसों को काटकर बिजली के सपनों को साकार करने के लिए नदियों को सुरंग में डाईवर्ट करने वाली परियोजनायें हिमालय की सेहत बिगाड़ रही है।
हिमालय में करोड़ों लोगों का निवास स्थान भी है लेकिन यहां से नीचे बहकर जा रही नदियों का रौद्र रूप जानलेवा बनता जा रहा है। इसलिए हिमालय को कितना भी रोज जपते रहेंगे उससे नुकसान की भरपाई कभी नहीं हो सकती है।क्योंकि विकास और पर्यावरण के बीच में जब संतुलन नहीं बना पा रहे हैं तो देखिए कि हिमालय क्षेत्र में लंबी-लंबी सुरंगों के निर्माण के बाद अनेकों जिंदगियां पिछले दो दशक में दफन हो गई इसके साथ ही हिमालय की अमूल्य प्राकृतिक संपदा का जो विनाश हुआ उसे वापस नहीं लौटाया जा सकता है।
इसी तरह बद्रीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर विष्णुगाड़- पीपलकोटी (444 मेवा) परियोजना पर वर्ष 2013-14 से कार्य प्रारंभ हुआ था और तब इसकी कीमत 1597 करोड रुपए थी। अनुबंध के आधार पर 54 महीनों में इसे पूरा करने का लक्ष्य था जिसे 2018 में पूरा होना था। लेकिन 8- 9 वर्ष अधिक व्यतीत हो जाने के बाद भी इसका बजट 6 हजार करोड़ से अधिक होने पर भी परियोजना निर्माण में बहुत लापरवाहियां सामने आई है। प्रभावित गांवों के लोगों ने अपनी सुरक्षा और विस्थापन के लिए धरना प्रदर्शन भी किया था जिसकी अनसुनी की गई। परियोजना में 13.4 किमी लंबी हेड रेस टनल के अलावा 3.04 लंबी टेल रेस टनल भी बनाई जा रही है जिसके द्वारा टरबाइन से होकर आने वाले पानी को अलकनंदा में छोड़ा जाएगा। लेकिन लगभग 16 किमी में अलकनंदा सूखी हुई स्थिति में दिखाई देगी। चार टरबाइन वाली इस परियोजना में भूमिगत निर्माण कार्य अधिक हो रहे है जहां मजदूर काम करते रहते हैं।13 अगस्त की घटना है कि पीपल कोटी के मायापुर क्षेत्र में निर्माण कार्य के दौरान भारी बारिश के चलते टनल में लगभग 1.6 किमी तक भूधंसाव का मलबा और पानी जमा हो गया था। जहां काम कर रहे 22 से अधिक मजदूर फंस गये। जिनमें से 8 मजदूरों की जिंदगी खत्म हो गई है अभी भी उसमें लोग लापता हैं।आपदा राहत और बचाव दल द्वारा बड़ी मुश्किल से लगभग 12 लोगों को रेस्क्यू किया गया है। इससे पहले भी 13 दिसंबर 2025 की रात परियोजना की निर्माणाधीन सुरंग के भीतर दो लोको ट्रेन की टक्कर हुई। उस समय भी 100 से अधिक मजदूर सुरंग के अंदर मौजूद थे जिसमें लगभग 80 लोग घायल हुए थे। हेलंग डैम साइड पर भी भूस्खलन की घटना हुई जिसमें आठ मजदूर घायल हुए थे। इसके अलावा निर्माणाधीन तपोवन- विष्णु गाड़ (520 मेवा)परियोजना की 12 किमी लंबी टनल में भी पानी का रिसाव होने लगा है। स्थिति यह बनी हुई है कि सुरंग के अंदर मजदूरों को जोखिमपूर्ण स्थिति में काम करना पड़ता है। परियोजना पर अधिकतर मजदूर छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा आदि राज्यों से है। उत्तराखंड के मजदूर बहुत न्यूनतम संख्या में हैं। यहां पर मारे गए मजदूरों को मुआवजे के रूप में 5 लाख की घोषणा की गई है जिसका स्थानीय बांध प्रभावित और मजदूर विरोध कर रहे हैं उन्होंने यहां निरीक्षण करने आये आपदा प्रबंधन मंत्री मदन कौशिक का घेराव किया है।
सुरंग हादसों का सिलसिला लंबे समय से जारी है जिसमें 7 फरवरी 2021 में भी ऋषि गंगा क्षेत्र में ग्लेशियर टूटने से अलकनंदा की सहायक धौली गंगा पर निर्मित ऋषि गंगा हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट (13 मेवा) पूरी तरह जमींदोज हो गया था। जिससे आगे एनटीपीसी की विष्णु गाड़- तपोवन परियोजना में लगभग 208 मजदूर मारे गये थे।2009 में भी तपोवन- विष्णु गाड़ जल विद्युत परियोजना की सुरंग में निर्माण कार्य के दौरान भूमिगत पानी के अचानक बढ़ने से भूगर्भिक अध्ययन में यह बात सामने आई थी कि निर्माण के दौरान सुरंग में पानी का दबाव, विस्फोटों के उपयोग से चट्टानों में दरारें और कमजोर क्षेत्र में सुरंग की खुदाई करना चिंता का विषय था।
यमुनोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर आल वेदर सड़क की दूरी कम करने के उद्देश्य से निर्माणाधीन सिलक्यारा टनल में मलबा जमा होने से 12 नवंबर 2023 से 17 दिन तक 41 मजदूर फंसे रहे। इसके बाद केंद्रीय राजमार्ग मंत्रालय ने दिसंबर 2025 में सुरंगों के ढहने की रोकथाम और बचाव के लिए एक गाइडलाइन जारी की थी। जिसमें मंत्रालय ने माना था कि हाल के वर्षों में हुये सुरंग हादसे से पहले परियोजना प्लानिंग के दौरान पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। लेकिन इस गाइडलाइन के अनुपालन में हुई लापरवाही के बाद पीपलकोटी जल विद्युत सुरंग में बड़ी संख्या में मजदूर घायल हुए थे।अभी 16 जुलाई 2025 को सिलक्यारा टनल के भीतर काम करने के दौरान एक मजदूर की जिंदगी चपेट में आ गयी। अगस्त 2025 में भी पिथौरागढ़ जिले की धौली गंगा पावर स्टेशन की सुरंग में हुये भूस्खलन में 19 कर्मचारी फंस गए थे। जिसमें कुछ को ही निकाला गया था। बाकी तक पहुंचना बचाव दल के लिए मुश्किल हो गया था। वाडिया भूगर्भ विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ० आरजे पेरूमल कहते हैं कि उत्तराखंड की सुरंग में सबसे नया दिखने वाला खतरा पानी है। बारिश का पानी सिर्फ सतह पर बहने वाला पानी नहीं बल्कि पहाड़ के भीतर चट्टानों में मौजूद दरारों से पानी नीचे आ जाता है जिसके कारण मालवा टूटकर सुरंग में जमा हो रहा है। सीधा अर्थ है कि बरसात के समय हिमालय की चट्टानों पर छेड़छाड़ से बचना चाहिए। अतः हिमालय में परियोजनाओं की सुरंग के आसपास के पहाड़, नदी, ग्लेशियर और मौसम को अलग करके नहीं देखा जा सकता है।
इन सब सावधानियो से ध्यान हटाकर ऋषिकेश- कर्णप्रयाग रेल लाइन में 17 सुरंगों पर काम हो रहा है। जहां 30 गांव के जल स्रोतों पर प्रभाव पड़ा है। देहरादून से टिहरी तक 30 किलोमीटर अंडरग्राउंड रोड बनाने के लिए भी सुरंग खोदने का प्रस्ताव है। अल्मोड़ा बाईपास के लिए 1228 मीटर की सुरंग को स्वीकृति दी जा रही है। पिथौरागढ़ से चमोली को जोड़ने के लिए भी टनल बनाने के लिए केंद्र सरकार से कहा जा रहा है। देहरादून- मसूरी सुरंग के लिए भी प्रस्ताव विचाराधीन है। प्रदेश में 30 से अधिक परियोजनाओं की टनल बनाई जा चुकी है। उत्तरकाशी से यमुनोत्री तक टनल निर्माण पर विचार हो रहा है।उत्तराखंड में लगभग 1000 गांव इन सुरंगों के आसपास बसे हुए है जहां घरों में दरारें पड़ रही है और जल स्रोत सूख रहे हैं जिसका मूल्यांकन करने वाला कोई नहीं है। सुरंग निर्माण से कमजोर चट्टानें बहुत जल्दी टूट कर गिर रही है। भूमिगत जल का दबाव सहन नहीं कर पाती है। निर्माण के दौरान मशीनरी और मजदूर सब खतरे में पड़ जाते हैं। सुरंग के अंदर श्रमिकों की आवाजाही, मशीनरी, लोको ट्रेनों में माल ढुलाई, संचार और ट्रैफिक प्रबंधन का भी एक जोखिम है। जो ऑपरेशन सुरक्षा पर सीधा सवाल खड़ा करती है।
2023 के बाद सुरंग आधारित परियोजनाओं को लेकर अतिरिक्त निगरानी और व्यवस्थाओं पर भी चर्चा हुई थी सुरंग में हर नयी खुदाई के साथ बदलते भूगर्भिक जोखिम का आकलन कितनी बार किया जाता है? जिसका कोई जवाब नहीं मिलता है। (लेखक के अपने विचार हैं)