
7 सितंबर वंदेमातरम सृजन स्मृति दिवस पर विशेष
लेखक : वेदव्यास
लेखक साहित्य मनीषी व वरिष्ठ पत्रकार हैं
www.daylifenews.in
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय लिखित वंदे मातरम् देश का राष्ट्रगीत है तो रवींद्रनाथ टैगोर लिखित जन गण मन हमारा राष्ट्रगान है। वंदे मातरम् जहां आनंदमठ (उपन्यास) का हिस्सा है वहां जन गण मन एक स्वतंत्र रचना है। पिछले दिनों राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के साथ ही उसी सम्मान के साथ राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के गायन को अनिवार्य बनाने वाले ‘राष्ट्र गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026’ संसद में पारित किया गया है।
अब समस्या यह है कि 1876 में जब आनंदमठ (उपन्यास) के अंतर्गत वंदे मातरम् गीत बंकिमचंद्र ने गाया था तब देश पर अंग्रेजों का साम्राज्य था लेकिन आज इस भारत गणराज्य में लोकतंत्र है जो समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता की बुनियादी अवधारणा से अनुप्राणित है। इस तरह 1947 में भारत को स्वाधीनता मिलने के समय तक ‘वंदे मातरम्‘ हमारे स्वाधीनता संग्राम का राष्ट्रगान था। 1937 में कांग्रेस के नेतृत्व में प्रांतीय सरकारें बनीं तो उन सरकारों ने भी वंदे मातरम् को अपने राष्ट्रीय गान की मान्यता दी थी, निश्चिय ही पूरे गीत को नहीं, बल्कि आरंभ के दो छंदों को। इस तरह सम्पूर्ण गीत पर आपत्ति का कारण वंदे मातरम् में निहित ‘मूर्तिपूजा‘ के भाव पर था। वंदे मातरम् में हिंदुत्व की गंध मिलने की यह मुखर घटना है और यह भी उल्लेखनीय है कि मुस्लिम संप्रदायवाद के उग्र उभार का काल भी यही है। पहली बार 1896 में कांग्रेस अधिवेशन के अवसर पर स्वयं कविवर रवींद्रनाथ टैगोर ने ‘वंदे मातरम्‘ गीत को मंच से गाया था। फिर 1950 में बंगभंग के विरोध में उठे आंदोलन के दौरान यह गान जन जन के कंठ से गूंज उठा और इसके बाद तो राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन की प्रगति के साथ सारे भारत ने इसे राष्ट्रगान के रूप में अपना लिया।
यहां यह जानना भी अनिवार्य रहेगा कि-आनंदमठ (उपन्यास) में प्रयुक्त वंदे मातरम् गीत जहां स्वतंत्रता संग्राम की क्रांति का बीजमंत्र माना गया है वहां कथावस्तु के नाते आनंदमठ (उपन्यास) 1970-71 के दौरान उत्तरी बंगाल में पड़े भयानक दुर्भिक्ष की पृष्ठभूमि में ऐतिहासिक सन्यासी विद्रोह की महागाथा है। बस यह हमारा दुर्भाग्य है कि 1920 के बाद भारतीय राजनीति में उभरे हिंदू-मुस्लिम साम्प्रदायिक विद्वेश ने स्वाधीनता के इस जीवन गान को भी अपनी चपेट में ले लिया है और आज उसी विभाजीत (हिंदू-मुस्लिम) राजनीति और मानसिकता का यह परिणाम है कि दोनों तरफ की साम्प्रदायिक ताकतें इस वंदे मातरम् गीत को गाने पर ऐतराज कर रही हैं।
क्योंकि लोकतंत्र में सहमति और असहमति को अनिवार्य रूप से साथ-साथ ही जीना-मरना है तो हम यह मानते हैं कि अब जन गण मन (राष्ट्रगान) की तरह वंदे मातरम् (राष्ट्रगीत) को भी धर्म और सम्प्रदाय की संकीर्ण राजनीति से अलग रखा जाना चाहिए। जिस तरह भारत का संविधान हमारे साझा सपनों की धरोहर है उसी तरह राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत भी हमारे साझा स्वाधीनता संग्राम का अमृतमंथन हैं।
जब हम मोहम्मद इकबाल का राष्ट्रीय तराना-सारे जहां से अच्छा, हिंदुस्तां हमारा, दिन रात गाते हैं तो हमारा मन और विचार कोई हिंदू-मुसलमान नहीं होता अपितु एक भारतीय नागरिक होता है। इसी तरह जब हम ताजमहल के सौन्दर्य को देखते हैं, बिस्मिल्लाह खां की पवित्र शहनाई को सुनते हैं, ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह में जाते हैं तो हमारा मन क्षणभर के लिए भी हिंदू-मुसलमान नहीं होता। ऐसे में वंदे मातरम् गाने का हिंदू साम्प्रदायिक राजनीति का दबाव भी गलत है तो इसे नहीं गाने का दुराग्रह और हठ भी मुस्लिम साम्प्रदायिक राजनीति करने वालों के लिए अनुचित है क्योंकि हम सबसे पहले एक भारतीय हैं। इसलिए वंदे मातरम् और जन गण मन जैसी हमारी गौरवपूर्ण पहचान को सहज और गैर-राजनैतिक नजरिये से ही देखा जाना चाहिए क्योंकि संविधान, राष्ट्रगान, राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगीत और राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम कोई दलीय, क्षेत्रीय और तुष्टिकरण जैसी संकीर्ण हिंदू-मुस्लिम सिख-ईसाई जैसी संकीर्ण राजनीति से बहुत परे और ऊपर है। तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि वंदे मातरम् गीत किसी भी तरह से कोई धार्मिक प्रार्थना नहीं है। मेरा ऐसे धर्मान्ध भाइयों से अनुरोध है कि वह 146 साल पुराने उपन्यास ‘आनंदमठ‘ को और इसमें शामिल वंदे मातरम् की 26 पंक्तियों की एक बार फिर से पढ़ें और देश, काल और परिवेश की परिस्थितियों में इस गीत को समझें। यह हमारे महान देश का दुर्भाग्य है कि धर्म और सम्प्रदाय के साथ जातीय-सम्प्रदायवाद और आतंकवाद की राजनीति करने वाले थोड़े से लोग आम जनता और आवाम के अज्ञात को अपने संकीर्ण स्वार्थों के लिए भुनाते रहते हैं और इसी का परिणाम है कि 21वीं शताब्दी के भारत में अफवाह फैला कर ही साम्प्रदायिक दंगे करवा दिए जाते हैं तो पत्थर की गणेष मूर्ति को दूध पिलवा दिया जाता है। वैमनस्य और नफरत की सियासी राजनीति का ही आज यह फल है कि हम देश के 17 करोड़ मुस्लिम भाई-बहनों से, उनके भारतीकरण करने की राजनीति चलाते रहते हैं और उसे अपना ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद‘ कहते रहते हैं। इस विभाजित राजनैतिक मानसिकता का ही यह दुष्परिणाम है कि कुछ संकीर्ण लोग भारत-पाकिस्तान के क्रिकेट मैच को भी हिंदू-मुसलमान का मुकाबला समझते रहते हैं और हर आंतकवादी घटना को मुसलमान और इस्लामिक जेहाद से जोड़कर देखते हैं। स्वतंत्र भारत में इस साम्प्रदायिक मानसिकता और विभाजन के मूल में सच तो यह है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और मुस्लिम लीग की राजनीतिक मेहरबानियां ही प्रमुख हैं। हम आज भी दिलीप कुमार से लेकर शाहरूख खान तक को जब फिल्मों में देखते हैं अथवा अशोक कुमार से लेकर अमिताभ बच्चन तक को जानते हैं तो फिर नूरजहां और लता मंगेशकर में हमें कोई हिंदू-मुसलमान दिखाई नहीं देता अपितु संगीत और अभिनय की इंसानी और रूहानी आवाज सुनाई पड़ती है।
वंदे मातरम् के संदर्भ में 1948 में जवाहरलाल नेहरू, ने लोकसभा में कहा था कि, ‘वंदे मातरम् स्पष्टतः और निर्विवाद रूप से भारत का प्रमुख राष्ट्रीय गीत है और महान् ऐतिहासिक परम्परा है। हमारे स्वतंत्रता संग्राम से इसका निकट का संबंध रहा है। इसका स्थान सदा बना रहेगा और दूसरा कोई गीत इसे विस्थापित नहीं कर सकता। यहीं नहीं आनंदमठ (उपन्यास) के 1882 में प्रकाशित मूल बंगला पाठ को पढ़कर भी हम सभी का यही अभिमत बनता है कि वंदे मातरम् का जन्म इस देश में आजादी के बाद बढ़ती साम्प्रदायिक राजनीति का हिस्सा नहीं है और यह राष्ट्रगीत किसी एक सम्प्रदाय की बपौती नहीं है। बिना पढ़े ओर जाने हमारे देश में विवाद खड़े करने की पुरानी संकीर्ण राजनीति है। अतः वंदे मातरम् को नकारना हमारे लिए गलत है और यह ठीक वैसे ही है जैसे कोई साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद की समर्थक पार्टियां और संगठन महात्मा गांधी को अपना राष्ट्रपिता नहीं मानते और उनकी हत्या को आज भी जायज ठहराते रहते हैं।
इसलिए वंदे मातरम् (राष्ट्रगीत) को राष्ट्रीय चेतना और लोक जागरण के संदर्भ में और उसकी सम्पूर्णता में पढ़ा जाना चाहिए। यह देश तो पहले ही इतना महान है कि यहां आज भी आधे से अधिक पढ़ी लिखी आबादी को अपना सहज सरल राष्ट्रगान (जनगणमन) तक पूरा याद नहीं है। फिर राष्ट्रगीत (वंदे मातरम्) को लेकर भ्रम और धर्म-सम्प्रदाय का राजनीतिक फैलाना तो महज एक अपराध है। कोई हमें बताए कि अंग्रेजों के राज में सभी स्कूली बच्चे ‘लौंग लीव द किंग‘‘ की प्रार्थना क्यों गाते थे और अंग्रेजों की इबादत/प्रार्थना क्यों करते थे। आज स्वतंत्र भारत का अपना राष्ट्रगीत (वंदे मातरम्) इस कारण भी सबके लिए अच्छा और जरूरी है क्योंकि हम भारतवासी हैं। अतः वंदे मातरम् एक राष्ट्रस्तुति है और कोई मूर्ति पूजा नहीं है। (लेखक के अपने विचार हैं)