
लेखक : राम भरोस मीणा
लेखक हरियाली बाबा के नाम से ख्यात पर्यावरणविद् व सामाजिक कार्यकर्ता हैं।
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आजादी के बाद बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य,खान-पान के प्रति अभिभावकों को जागरूक करने, बाल विकास परियोजनाओं का संचालन करने के लिए सरकारें हमेशा प्रयासरत रहीं हैं। इस अभियान के तहत अभिभावकों को जागरूक किया गया है, जागरूकता के अभियान चलाए गये हैं। बच्चों को राष्ट्रीय धरोहर समझा गया और उनको राष्ट्र का भविष्य माना गया हैं। यही नहीं शोषण से बचाव के अनेकों प्रयास भी किए गये हैं। बौद्धिक, शारीरिक विकास पर बल दिया गया है। इसके साथ-साथ मानसिक प्रताड़नाओं से बचाने, शिक्षा को अनिवार्य करने के अलावा बाल-श्रम से मुक्ति के प्रयास भी किए जाते रहे हैं। नौनिहालों के उज्वल भविष्य के लिए विद्यालयों का संचालन, आवश्यकता के साथ क्रमोन्नत करना, निशुल्क शिक्षा पहली प्राथमिकता रही है। ड्रॉप आउट छात्रों को पुनः विद्यालय से जोड़ना, उन्हें क्रमोन्नत करना, अनुकूल वातावरण पैदा करना और स्वच्छ सुंदर विद्यालय होने का जिम्मा संचालक स्वयं अपनी जिम्मेदारी समझते थे। अच्छे भवनों का निर्माण करना, अच्छे शिक्षकों का चयन करना सरकार के एजेंडे में शामिल रहा। परिणामस्वरूप लोगों में जागरूकता पैदा हुई, शिक्षा का स्तर अच्छा बना, प्रत्येक बच्चा स्कूल जाने लगा। दलित, पिछड़ा , आदिवासी, सवर्ण सभी बिना भेद-भाव एक ही छत के नीचे शिक्षा ग्रहण करने लगे। विद्यालयों से महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में अध्ययन कर राष्ट्र निर्माण में अपनी अहम भूमिका निभाने लगे। परिणामस्वरूप शिक्षा का स्तर सुधरा, रहन-सहन, खान-पान, पहनावे में आधुनिकता दिखाई देने लगी। परिवर्तन दिखाई दिया। अमीर के साथ गरीब के बच्चे शिक्षा पाने लगे, महिला शिक्षा को साथ में बढ़ावा मिला और शिक्षा जीवनोपयोगी व सार्थक बनी।
लेकिन शिक्षा में सुधार के नाम पर पिछले डेढ़ दशक के दौरान राज्य तथा केन्द्र की निजी विद्यालयों को प्रोत्साहित करने की नीति ने बंटाधार कर दिया।राजकीय विद्यालयों में व्यवस्थाओं के नाम पर खानापूर्ति होने लगी। इस नीति से महज़ एक दो प्रतिशत छात्रों को अच्छे विद्यालयों में अध्यन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह बिल्कुल सत्य है। इसे नकारा नहीं जा सकता। परिणामस्वरूप सरकार का ध्यान राजकीय विद्यालयों से भटक गया। यह भी कटु सत्य है। नतीजन सरकारी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का खात्मा होने लगा, अध्यापक अपनी जिम्मेदारी से मुकरने लगे और आईफोन लेकर विद्यालय के वातावरण को बनाने के बजाय दूषित करने में सहयोगी बन बैठे। गौरतलब है जिनको जिम्मेदारी दी गई वो नाम के अध्यापक रह गये, पुस्तकीय ज्ञान दिया जाना प्रारंभ हुआ, व्यवहारिक, सामाजिक, प्रशासनिक, राजनैतिक शिक्षा देना वे अपनी जिम्मेदारी नहीं मानते हुए ढ़ाई अक्षर पढ़ाना अपनी जिम्मेदारी समझने लगे।
ऐसे हालात में अभिभावक अपने बच्चों को मोबाइल के गाने सुनने या गुरु जी के फ़ोन में वीडियो देखने भला कब तक स्कूल.भेजें। आखिर उसे औने-पौने, उल्टे सीधे कर्ज से प्राइवेट विद्यालयों में दाखिला दिलाना है। लेकिन अभी भी कुछ भले आदमी हैं, जिनके पास आज भी शिक्षा के प्रति अज्ञानता है, संसाधनों का अभाव है, वे जागरूक नहीं है। वे गुरु जी के बहकावे में आ कर अपने भविष्य को उस जगह पढ़ने भेज रहे हैं जहां पढ़ाने वाले ही श्रम महसूस नहीं करते, अपनी जिम्मेदारी, अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करते। वैसे भी उनका दोष भी क्या है, जब सारा का सारी सिस्टम ही ख़राब हो चुका है।
अब कोकरोच द्वारा शिक्षा का मुद्दा उठाने के बाद सब कुछ डावांडोल सा हो गया है। आप विद्यालय में सीधे प्रवेश नहीं कर सकते, कक्षाओं का मुआयना नहीं कर सकते, अच्छे बुरे का फोटो वीडियो नहीं बना सकते, शिकायत नहीं कर सकते। यदि आप बिना इजाजत प्रवेश कर गए, पूर्व में आपकी अध्यापक से ठनी हुई है तो सतर्क रहें। आपको वो जेल भी भिजवा सकते हैं। ऐसे हालातो मे अभिभावक विद्यालयों में प्रवेश करना भूल से गए हैं।
अब बात आती है कि हम करना क्या चाहते है, बच्चों को किस दिशा में लेकर जा रहे हैं। विद्यालय का वातावरण कैसा बना रहे हैं, संस्कार क्या दे रहें हैं। हमें जिम्मेदारी पढ़ाने की दी गई या राजनैतिक चर्चा करने, विद्यालय में चैट करने, फोन पर वार्तालाप और मनोरंजन करने अथवा गपशप करने की।
आज सोचना अध्यापक को ही नहीं है, बल्कि आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज और सरकार के साथ विपक्ष भी गहनता से इस मुद्दे पर संज्ञान ले। आवश्यकता इस बात की भी है कि क्या जाएज है ? विद्यालय में अध्यापक बालिकाओं का एक वाशरुम होना, बारह कक्षाओं के लिए चार पांच कमरे होना, एक सौ बच्चों पर पन्द्रह अध्यापक और परिणाम शून्य होना, नन्हें बच्चों के साथ दुर्व्यवहार करना ये वे सवाल हैं जिनपर विचार समय की मांग है। केवल पुस्तिकाएं पढ़ाना और वे भी पूर्ण जानकारी के साथ नहीं। फिर भला उस अध्यापक, विद्यालय की आवश्यकता ही क्या है? इससे भला अनपढ़ रहने में ही लाभ अधिक है। फिर भी यदि सरकार और प्रशासन एवं अध्यापक अपनी-अपनी जिम्मेदारी पुनः ले कर अपनी खामियों को सुधारने का प्रयास करें, व्यवस्थाओं में अव्यवस्थाएं उत्पन्न ना करें, प्रत्येक ग्रामीण बालक-बालिका को विद्यालय में प्रवेश के साथ सहजता से पेश आएं, कमियों को सुनें, सहयोग की बात करें, बच्चों के सर्वांगीण विकास को लेकर कार्य करने पर ही सरकारी स्कूलों में नामांकन बढ़ने के साथ अध्यापकों का सम्मान बना रह सकता है। अन्यथा वह समय दूर नहीं जहां सरकारी अध्यापक के नाम पर मानव समाज घृणा करेगा, उनको हेय दृष्टि से देखेगा और अध्यापक का आदर-सत्कार भी खत्म हो जाएगा। अतः समय रहते सुधार कर गुरु शब्द को अपमानित होने से बचाया जाए और नौनिहालों के भविष्य को संवारा जाएं। (लेखक के अपने विचार है।)