रुपए का अवमूल्यन

लेखिका : लता अग्रवाल
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)
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विदेशी मुद्रा के मुकाबले भारतीय मुद्रा के मूल्य में निरंतर गिरावट जारी है। सन् 1991 में रूपये का मूल्य अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 17 रुपए था। सन् 2025 में 90 रू. अब 94 रुपए हो गया है। रूपये के अवमूल्यन से देश के प्रधानमंत्री की साख पर सवाल खड़े होते हैं। रूपये में लगातार गिरावट प्रधानमंत्री के लिए सीधी चुनौती है। रूपये का अवमूल्यन केवल डालर ही नहीं दूसरे अन्य कई देशों की मुद्रा के मुकाबले भी कम है। इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। महंगाई बढ़ती है।
रूपया लगातार गिरावट की ओर बढ़ रहा है ये केवल मात्र समायोजन नहीं है बल्कि रुपए की क्रय शक्ति में कमी है। इसका भार जनता पर पड़ता है। रूपये के अवमूल्यन को प्रधानमंत्री की आर्थिक नीतियों की विफलताओं से आंका जा सकता है। विपक्ष सरकार की क्षमताओं पर सवाल उठाते है। अवमूल्यन का मुख्य कारण विदेश से आयात ज्यादा और निर्यात कम होता है।
सरकार अपने देश के निर्यात को बढ़ावा दे। विलासिता की वस्तुओं का आयात कम से कम किया जाए। विदेशों में पढ़ाई और यात्रा करना बहुत खर्चीला हो जाता है।
कच्चे माल के आयात के लिए कम्पनियो को मुनाफा कम मिलता है तो निर्मित वस्तुओं के दाम बढ़ा दिए जाते हैं। सबसे मुख्य बात यह है कि सरकार को विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग करके डॉलर की आपूर्ति को स्थिर रखना होगा। (लेखिका के अपने विचार हैं)

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