
जाफ़र लोहानी
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मनोहरपुर (जयपुर)। गर्मी की तपिश 45 डिग्री थी, पर खोजावाला की रेत पर नंगे पांव चल रहे हजारों अकीदतमंदों के कदम नहीं डगमगाए। जुबां पर सिर्फ एक ही नाम था: या बाला पीर। हजरत बाला पीर रहमतुल्लाह अलैह के सालाना उर्स ने सालों का रिकॉर्ड तोड़ दिया।
सुबह की पहली किरन के साथ ही दरगाह का मंजर देखने लायक था। बूढ़े कंधों पर बच्चे, औरतों की गोद में मन्नत के नारियल, मर्दों के हाथ में चादर और फूल। सब एक ही धुन में बढ़ रहे थे।
- 786 का धागा: टूटी उम्मीदों की आखिरी डोर
दरगाह के सहन में लगे पुराने जाल के पेड़ पर एक भी टहनी खाली नहीं थी। हर डाल पर 786 के धागे बंधे थे। पीले, लाल, हरे धागे। हर धागे के साथ एक कहानी बंधी थी। किसी ने बेटे की नौकरी मांगी, किसी ने बीमार मां की सेहत, किसी ने उजड़े घर को बसाने की दुआ।
सीकर से आई रेशमा बानो फफक कर रो पड़ीं। बोलीं, पाँच साल से औलाद नहीं थी। पिछले उर्स पर धागा बांधा था। देखो, गोद में छह महीने का चांद है। आज शुकराने की चादर चढ़ाने आई हूं।
यहा पता चलता है कि बाला पीर का दर सिर्फ दरगाह नहीं, हिंदुस्तान की तहजीब का घर है। - कव्वाली: जब रात ने सुबह होने से
इनकार कर दिया
स्थानीय भजन व कव्वाल करने वालो ने जैसे ही गाया, भर दो झोली मेरी या बाला पीर, पूरी दरगाह सजदे में झुक गई।
सूफियाना कलाम पर बुजुर्ग झूमे, जवान रोए। फज्र की अजान तक महफिल जमी रही। लगता था जैसे वक्त ठहर गया हो। रेत, चांदनी और बाला पीर का नाम। इसके सिवा कुछ याद नहीं। - करामात नहीं, कायनात है बाला पीर
खादिमो ने कहा, बाबा सदियों पुराने वली हैं। पर वो करामात के लिए नहीं, कायनात से मोहब्बत के लिए जाने गए। उन्होंने कहा था कि भूखे को रोटी दो, चाहे वो किसी भी मजहब का हो।
बाबा का असली पैगाम यही है। नफरत के इस दौर में बाला पीर की दरगाह वो जगह है जहां इंसान सिर्फ इंसान रहता है। न हिंदू, न मुसलमान। अब्दुल अज़ीज़ लोहानी ने शायराने अंदाज़ में कहा कि “हद तपे सो औलिया बे हद तपे सो पीर हद बेहद दोनों तपे ताको नाम फ़क़ीर”!