



सहायक क्षेत्रीय निदेशक, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, इग्नू क्षेत्रीय केंद्र जयपुर राजस्थान। इग्नू क्षेत्रीय केंद्र जयपुर, 70/80 पटेल मार्ग, मानसरोवर, जयपुर, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।
एक शिक्षाविद्, स्वतंत्र सोशल मीडिया पत्रकार, स्वतंत्र और निष्पक्ष लेखक, मीडिया विशेषज्ञ, सामाजिक राजनीतिक विश्लेषक, वैज्ञानिक और तर्कसंगत वक्ता, संवैधानिक विचारक और कश्मीर घाटी मामलों के विशेषज्ञ और जानकार।
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हिंदी पखवाड़ा समारोह के मौके पर, ऑनलाइन ज़ूम मीटिंग के ज़रिए मुझे ‘गुरुकुल यूके’ (यूनाइटेड किंगडम) और ‘हिंदी साहित्य भारती’ द्वारा ‘भारतीय संस्कृति और हिंदी’ विषय पर एक अंतरराष्ट्रीय चर्चा और विचार-विमर्श में शामिल होने का मौका मिला।
इस ऑनलाइन ज़ूम मीटिंग के ज़रिए कार्यक्रम का आयोजन संयुक्त रूप से ‘गुरुकुल यूके’ (यूनाइटेड किंगडम) और ‘हिंदी साहित्य भारती’ ने किया था। इस शानदार और अहम चर्चा-सत्र का संचालन और मॉडरेशन यूनाइटेड किंगडम (मैनचेस्टर/लंदन) में रहने वालीं जानी-मानी हिंदी शिक्षिका डॉ. इंदु बारोठ जी ने किया, जो ब्रिटेन में ‘गुरुकुल यूके’ चलाती हैं।
इस चर्चा और विचार-विमर्श में, मैं (डॉ. कमलेश मीना) भी डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी जी, प्रोफेसर हनुमान प्रसाद शुक्ला जी, डॉ. अनुराधा पांडे जी और डॉ. विभाकर कुमार दीक्षित जी जैसे हिंदी और संस्कृत भाषा के जाने-माने प्रोफेसरों, शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों के साथ एक पैनलिस्ट के तौर पर शामिल हुआ।
डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी एक भारतीय अभिनेता, फ़िल्म निर्देशक और पटकथा लेखक हैं। वे मुख्य रूप से 1991 के ऐतिहासिक टीवी सीरियल ‘चाणक्य’ के निर्देशन के लिए जाने जाते हैं, जिसमें उन्होंने राजनीतिक रणनीतिकार चाणक्य की मुख्य भूमिका भी निभाई थी। चाणक्य का किरदार लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है।
यहां मैं इस उद्धरण के माध्यम से डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी जी के महान व्यक्तित्व के बारे में कुछ कहना चाहूंगा कि
हजारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पर रोती है!
तब जाकर कहीं चमन में दीदावर पैदा होता है!!
डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी को पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। उन्हें ‘राष्ट्रीय एकता पर सर्वश्रेष्ठ फ़ीचर फ़िल्म’ के लिए नरगिस दत्त पुरस्कार भी मिला है; यह भारत का एक प्रतिष्ठित वार्षिक राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार था, जिसे अब आधिकारिक तौर पर नया नाम और नया रूप दिया गया है। डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी एक बेहद सम्मानित भारतीय फ़िल्म निर्माता, पटकथा लेखक और अभिनेता हैं। उन्होंने अपने रचनात्मक सफ़र की शुरुआत थिएटर से की और बाद में टेलीविज़न और सिनेमा की ओर रुख़ किया। यहाँ वे अपनी गहरी रिसर्च पर आधारित ऐतिहासिक और पौराणिक कथाओं के लिए काफ़ी मशहूर हुए। पिंजर (2003) यह उनकी सबसे ज़्यादा सराही गई और अहम फ़िल्म थी, जो अमृता प्रीतम के मशहूर पंजाबी उपन्यास पर आधारित थी। भारत के बँटवारे के समय पर आधारित इस दुखद प्रेम कहानी ने ‘राष्ट्रीय एकता पर सर्वश्रेष्ठ फ़ीचर फ़िल्म’ का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार जीता। मोहल्ला अस्सी (2018) सनी देओल अभिनीत यह एक व्यंग्यात्मक ड्रामा फ़िल्म है, जो डॉ. काशीनाथ सिंह के उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ पर आधारित है। यह फ़िल्म वाराणसी के घाटों के आस-पास धर्म के व्यवसायीकरण पर केंद्रित है। सम्राट पृथ्वीराज (2022) अक्षय कुमार अभिनीत यह एक बड़े पैमाने पर बनी ऐतिहासिक एक्शन ड्रामा फ़िल्म है। यह ब्रज भाषा की महाकाव्य कविता ‘पृथ्वीराज रासो’ पर आधारित है, जिसमें राजपूत योद्धा राजा पृथ्वीराज चौहान के जीवन का वर्णन है। ज़ेड प्लस (2014) आदिल हुसैन अभिनीत यह एक सामाजिक-राजनीतिक कॉमेडी और व्यंग्य फ़िल्म है, जो भारत की राजनीतिक व्यवस्था और सुरक्षा संस्कृति पर मज़ेदार अंदाज़ में कटाक्ष करती है।
फ़िल्मों के निर्देशन के अलावा, डॉ. द्विवेदी को भारतीय टेलीविज़न में उनके अहम योगदान के लिए भी बहुत सराहा जाता है, जिसमें ये लोकप्रिय सीरियल शामिल हैं। चाणक्य (1991) यह उनकी सबसे बेहतरीन रचना (मास्टरपीस) है। उन्होंने इसे लिखा, निर्देशित किया और इसमें राजनीतिक रणनीतिकार चाणक्य (विष्णुगुप्त) की मुख्य भूमिका निभाई। अपने दार्शनिक संवादों और ज़बरदस्त अभिनय के कारण यह भारतीय टेलीविज़न के इतिहास के सबसे यादगार ऐतिहासिक सीरियलों में से एक बना हुआ है। मृत्युंजय (1996) महाभारत के पात्र कर्ण के जीवन पर आधारित यह एक महाकाव्य सीरीज़ थी, जिसके लिए उन्हें ‘स्क्रीन वीडियोकॉन बेस्ट डायरेक्टर अवॉर्ड’ मिला। उपनिषद गंगा (2012) 38 एपिसोड वाली एक बहुत ही ज्ञानवर्धक और दार्शनिक सीरीज़, जिसने उपनिषदों और वैदिक संस्कृति के मुश्किल कॉन्सेप्ट्स को आसान बनाया। स्क्रीन पर सफल होने से पहले, डॉ. द्विवेदी एक क्वालिफाइड मेडिकल प्रोफेशनल थे, लेकिन भारतीय क्लासिकल साहित्य और कला के प्रति अपने गहरे लगाव के कारण उन्होंने मेडिकल का पेशा छोड़ दिया। अपने करियर की शुरुआत में उन्होंने थिएटर में सक्रिय रूप से काम किया और क्लासिकल ट्रेनिंग वाले स्टेज एक्टर्स को इकट्ठा किया, जिन्हें बाद में उन्होंने अपनी फ़िल्म और टेलीविज़न कास्टिंग में शामिल किया।
डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी जी, आपने हर विषय और पहलू की गहराई से पड़ताल की और अपनी बहुमूल्य अंतर्दृष्टि से हम सभी को समृद्ध किया; यह हमारे लिए सचमुच प्रेरणादायक था। आपकी गरिमामयी उपस्थिति और दूरदर्शी सोच ने इस कार्यक्रम को सार्थक और सफल बनाया। इस ऑनलाइन ज़ूम (मीटिंग) बौद्धिक चर्चा का हिस्सा बनने के लिए मैं आपका हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।
प्रोफ़ेसर हनुमान प्रसाद शुक्ला, जो अयोध्या (राम की नगरी) की मिल्कीपुर तहसील के बलारमऊ गाँव के रहने वाले हैं, अभी महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में तुलनात्मक साहित्य विभाग में प्रोफ़ेसर के तौर पर काम कर रहे हैं। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित हस्ती, प्रोफ़ेसर शुक्ला हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति के जानकार के रूप में जाने जाते हैं। वे तीन दशकों से रिसर्च, एकेडमिक लेखन और अध्यापन के काम में सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं; उन्होंने कई किताबें लिखी और एडिट की हैं, साथ ही विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स में रिसर्च पेपर भी प्रकाशित किए हैं। उन्होंने हाल ही में एक किताब प्रकाशित की है, जिसमें राष्ट्र, धर्म और संस्कृति जैसे विषयों पर चर्चा की गई है। उन्होंने साहित्य विभाग और भाषा एवं संस्कृति विभाग के प्रमुख के तौर पर काम किया है। वे तीन बार भाषा संकाय (Faculty of Language) के डीन रहे हैं और अनुवाद एवं व्याख्या संकाय (Faculty of Translation and Interpretation) के डीन के तौर पर भी काम कर चुके हैं। अभी, प्रोफ़ेसर शुक्ला अंतरराष्ट्रीय हिंदी शिक्षण विभाग के प्रमुख, अनुवाद अध्ययन विभाग के प्रमुख और अनुवाद एवं व्याख्या संकाय के डीन के तौर पर अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभा रहे हैं।
इसके अलावा, ‘परा विद्या उच्च शोध एवं ज्ञान सृजन केंद्र’ (Centre for Advanced Research and Knowledge Creation in Para Vidya) के निदेशक के तौर पर वे भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं। एक इंटरनेशनल स्टूडेंट एडवाइज़र के रूप में, वे अलग-अलग कार्यक्रमों और गतिविधियों के ज़रिए विदेशी छात्रों को हिंदी भाषा से जोड़ने की कोशिश करते हैं। प्रोफ़ेसर शुक्ला हिंदी के दायरे को बढ़ाने और इसे ज्ञान के एक क्षेत्र के रूप में विकसित करने के लिए लगातार समर्पित हैं। उन्हें काव्यशास्त्र, भाषा-विज्ञान और तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन में गहरी रुचि है।
यूनाइटेड किंगडम के लंदन में स्थित भारत का उच्चायोग में हिंदी और सांस्कृतिक अताशे (Cultural Attaché) के तौर पर काम कर रहीं राजनयिक श्रीमती अनुराधा पांडे का स्वागत और सम्मान करना तथा उन्हें सुनना मेरे लिए खुशी और सम्मान की बात थी।
इस शानदार चर्चा ‘भारतीय संस्कृति और हिंदी’ का आयोजन करने और भारतीय संस्कृति व हिंदी पर आधारित इस दिल को छू लेने वाले कार्यक्रम का हमें हिस्सा बनाने के लिए ”गुरुकुल यूके’ (यूनाइटेड किंगडम) और ‘हिंदी साहित्य भारती’ का धन्यवाद। वर्तमान में लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग में हिंदी और सांस्कृतिक अधिकारी के रूप में कार्यरत डॉ. अनुराधा पांडे—जो एक विद्वान, साहित्यकार और वरिष्ठ अधिकारी हैं—हिंदी को केवल एक आधिकारिक भाषा के रूप में ही नहीं, बल्कि भारतीय पहचान, सांस्कृतिक स्मृति और वैश्विक संवाद की एक जीवंत भाषा के रूप में स्थापित करने के लिए समर्पित हैं।
डॉ. कमलेश मीना वर्तमान में दुनिया के सबसे बड़े मुक्त विश्वविद्यालय में से एक, जिसे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) के नाम से जाना जाता है, इग्नू क्षेत्रीय केंद्र जयपुर, राजस्थान में सहायक क्षेत्रीय निदेशक के रूप में काम कर रहे हैं जो विश्वविद्यालय की शैक्षणिक जिम्मेदारी और कर्तव्य का हिस्सा है। डॉ. कमलेश मीना ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) के कई क्षेत्रीय केंद्रों जैसे गुवाहाटी, जयपुर, खन्ना, श्रीनगर और भागलपुर में अपनी सेवाएं दी हैं। डॉ. कमलेश मीना को इग्नू के सबसे बड़े क्षेत्रीय केंद्रों में से एक क्षेत्रीय केंद्र श्रीनगर कश्मीर में क्षेत्रीय निदेशक प्रभारी के रूप में सेवा करने का अवसर मिला है। डॉ. मीना प्रसिद्ध सोशल मीडिया लेखक, वक्ता और पत्रकारिता एवं मास मीडिया के विशेषज्ञ हैं। डॉ.कमलेश मीना ने महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय अजमेर राजस्थान में कप्तान दुर्गा प्रसाद चौधरी पत्रकारिता और मल्टीमीडिया संस्थान के संकाय सदस्य के रूप में कार्य किया है। डॉ.कमलेश मीना ने देश भर के विभिन्न उच्च शिक्षा संस्थानों, सरकारी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के माध्यम से एक सौ पचास से अधिक व्याख्यान दिए हैं। डॉ. कमलेश मीना आकाशवाणी और दूरदर्शन केंद्र के जाने-माने व्यक्तित्व हैं और विभिन्न चर्चाओं और विचार-विमर्शों के माध्यम से अपनी बात रखते रहे हैं। डॉ.कमलेश मीना तर्कसंगत विचार वाले व्यक्ति हैं और उन्होंने अपने शैक्षणिक योगदान और उपस्थिति के दौरान हमेशा सामाजिक न्याय, समानता, ईमानदारी, वैज्ञानिक चर्चा और तार्किक चर्चा की वकालत की है। डॉ. कमलेश मीना ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) के कार्यभार के माध्यम से कश्मीर घाटी, राजस्थान, बिहार और पंजाब में जमीनी स्तर पर गहनता से काम किया और इग्नू के माध्यम से उच्च शिक्षा के अवसर का लाभ उठाने के लिए कई शिक्षार्थी सहायता केंद्र (इग्नू अध्ययन केंद्र) स्थापित किए। संक्षिप्त विवरण में डॉ.कमलेश मीना बहुमुखी प्रतिभा के धनी अद्भुत व्यक्तित्व हैं। डॉ.कमलेश मीना जोशीले, प्रतिबद्धतापूर्ण और आकर्षक व्यक्तित्व वाले प्रभावी वक्ता के रूप में जाने जाते हैं।
इसके अलावा डॉ. कमलेश मीना न केवल मीडिया में बल्कि प्रशासन सह शैक्षणिक क्षेत्र में भी एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और तटस्थ लेखक, वक्ता और पर्यवेक्षक व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं। दिलचस्प बात यह है कि एक तरफ डॉ. कमलेश मीना दुनिया के सबसे बड़े मुक्त विश्वविद्यालय में से एक से जुड़े हुए हैं, जो पीपुल्स यूनिवर्सिटी (जन-जन का विश्वविद्यालय) इग्नू के रूप में प्रसिद्ध है और दूसरी तरफ डॉ. मीना दुनिया के सबसे बड़े आध्यात्मिक विश्वविद्यालय में से एक से जुड़े हुए हैं, जिसे प्रजापति ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है।
सच कहूँ तो, मेरे लिए यह भारतीय सिनेमा के महान व्यक्तित्व डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी जी, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय (वर्धा, महाराष्ट्र) के जाने-माने शिक्षाविद प्रोफ़ेसर हनुमान प्रसाद शुक्ला जी, लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग में हिंदी और सांस्कृतिक अधिकारी के रूप में कार्यरत डॉ अनुराधा पांडे जी और मैनचेस्टर (लंदन) स्थित ‘गुरुकुल यूके’ की संचालिका डॉ. इंदु बारोठ जी को सुनने और उनसे बातचीत करने का एक बहुत ही सुंदर, सुखद, ज्ञानवर्धक और अनोखा अवसर था।
आयोजक ‘गुरुकुल यूके’ की डॉ. इंदु बारोट जी द्वारा मुझे दिए गए 10 से 12 मिनट के समय में, मैंने ‘हिंदी दिवस’ के मौके पर आयोजित ‘हिंदी पखवाड़ा’ कार्यक्रम के दौरान ‘भारतीय संस्कृति और हिंदी’ विषय पर अपने विचार और राय साझा की। मैं डॉ. इंदु बारोठ जी का बहुत-बहुत आभारी हूँ कि उन्होंने मुझे पद्मश्री डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी जी (जो एक बहुत मशहूर फ़िल्म निर्माता और निर्देशक हैं) और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के जाने-माने एकेडमिक प्रोफ़ेसर हनुमान प्रसाद शुक्ला जी के साथ मुख्य वक्ता (की-नोट स्पीकर) के तौर पर आमंत्रित किया। इस छोटे से लेख में डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी जी, प्रोफ़ेसर हनुमान प्रसाद शुक्ला जी, डॉ. अनुराधा पांडे जी और डॉ. दीक्षित जी द्वारा दी गई व्याख्या का पूरा वर्णन करना संभव नहीं है, लेकिन मैं यह ज़रूर कहना चाहूँगा कि यह चर्चा भारतीय संस्कृति, परंपरा, पहचान और प्रतिष्ठा की जड़ों से जुड़ने के बारे में थी। यह शानदार पहल डॉ. इंदु बारोठ जी ने की है, जो यूनाइटेड किंगडम के मैनचेस्टर में हिंदी भाषा पर आधारित ‘गुरुकुल यूके’ चला रही हैं और भारत तथा उसकी संस्कृति, भाषा, नाम, यश, गौरव और पहचान की सच्ची प्रतिनिधि के तौर पर काम कर रही हैं।
डॉ. इंदु बारोठ जी, हिंदी पखवाड़ा समारोह के दौरान ऑनलाइन ज़ूम मीटिंग चर्चा और विचार-विमर्श कार्यक्रम के माध्यम से मुझे भारतीय सिनेमा और हिंदी साहित्य की महान हस्तियों से बातचीत करने का यह सुंदर अवसर देने के लिए मैं आपका बहुत आभारी हूँ। सचमुच, मैं आपके इस उदार व्यवहार के लिए तहे दिल से आपका धन्यवाद और आभार व्यक्त करता हूँ। (लेखक के अपने विचार हैं)