
मधुमक्खियां गायब हुईं तो थाली में क्या बचेगा?
लेखिका : रेणु जैन
इंदौर (मध्य प्रदेश) भारत
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मान लीजिए कल सुबह दुनिया की सारी मधुमक्खियां अचानक गायब हो जाएं। शुरुआत में शायद इंसान खुशी मनाए—“वाह! अब न डंक का डर, न घर में घुसती मधुमक्खियों की आफत।” लेकिन यह खुशी ज्यादा देर नहीं टिकेगी। कुछ समय बाद बाजार में फलों और मेवों की कीमत देखकर शायद लोग कहेंगे—“भाई, मधुमक्खियां वापस बुलाओ!”दरअसल मधुमक्खी सिर्फ शहद बनाने वाली जीव नहीं, बल्कि प्रकृति की बिना वेतन वाली परागण विशेषज्ञ है। फूलों से परागकण एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाकर वह पौधों के प्रजनन और फल-बीज बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यानी खेत में किसान फसल उगाता है, लेकिन प्रकृति की यह नन्ही कर्मचारी भी पर्दे के पीछे अपनी ड्यूटी निभाती रहती है।
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुसार, दुनिया की लगभग 75 प्रतिशत प्रमुख खाद्य फसलें किसी न किसी रूप में परागणकर्ताओं पर निर्भर हैं। फलों, सब्जियों, मेवों और तिलहनों की अनेक फसलें इनके योगदान से प्रभावित होती हैं। हां, यह कहना गलत होगा कि मधुमक्खियां खत्म होते ही इंसान भूखा मर जाएगा। गेहूं, चावल और मक्का जैसी कई प्रमुख फसलें मुख्यतः हवा से परागित होती हैं। मगर परागणकर्ताओं में भारी गिरावट खाद्य विविधता, पोषण और कृषि उत्पादन के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।
चिंता की बात यह है कि मधुमक्खियों के सामने खतरे बढ़ रहे हैं। कीटनाशकों का अनुचित इस्तेमाल, प्राकृतिक आवासों का नष्ट होना, जलवायु परिवर्तन, रोग और भोजन की कमी इनके लिए मुश्किलें पैदा कर रहे हैं।अब जरा सोचिए—जिस जीव का वजन कुछ ग्राम भी नहीं, वह हमारी खाद्य-व्यवस्था में इतनी बड़ी भूमिका निभाता है! इसलिए अगली बार मधुमक्खी दिखे तो उसे सिर्फ “डंक वाली मुसीबत” न समझें। वह प्रकृति की ऐसी कर्मचारी है जो न वेतन मांगती है, न प्रमोशन और न रविवार की छुट्टी।
मधुमक्खी बचाना केवल शहद बचाना नहीं है। यह फूल, खेती, जैव-विविधता और हमारी थाली का भविष्य बचाना है। सच यही है—भनभनाहट छोटी है, लेकिन उसका महत्व बहुत बड़ा। (लेखिका के अपने विचार हैं)