
लेखक : लोकपाल सेठी
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक
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लगभग 12वर्ष पूर्व जब आंध्र प्रदेश का विभाजन कर तेलंगाना प्रदेश बनाया गया था तो अविभाजित आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद तेलंगाना के हिस्से में आई थी। नया प्रदेश बनाने के लिए संसद ने जो कानून पारित किया था उसमें कहा गया था कि अगले 10 साल तक हैदराबाद दोनों प्रदेशों की राजधानी रहेगा। इस बीच आंध्र प्रदेश को अपनी अलग से राजधानी का निर्माण करना पड़ेगा। इसके लिए केंद्र ने वित्तीय संसाधन देने के बात कही गई थी।
विभाजन से पूर्व राज्य में तेलुगु देशम पार्टी की सरकार थी तथा चन्द्रबाबू नायडू राज्य के मुख्यमंत्री थे। उसके हिस्से में आये आंध्र प्रदेश की लिए उन्होंने ऐसे स्थान की तलाश शुरू की जो राज्य की राजधानी के लिए पूरी तरह से उपयुक्त हो। अंत में कृष्णा नदी के पास स्थित अमरावती को राज्य की नई राजधानी बनाने के लिया चुना गया। यह बात 2014 की है। उन्होंने वायदा किया कि अगले पांच साल में राज्य की नई राजधानी बनकर तैयार हो जायेगी। उन्होंने यह भी कहा कि नई राजधानी पूरी तरह ग्रीन होगी तथा यह शहर विश्व स्तरीय होगा। इसके डिज़ाइन करने के लिए कई नामी देसी और विदेशी कंपनियों को आमंत्रित किया गया। इसी प्रकार विश्व बैंक तथा अन्य वित्त संस्थायों से कर्ज़ लेने की व्यवस्था की गई। लगभग 30 गांवों के किसानों की 36,000 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया गया। लेकिन वित्तीय संसाधनों की कमी से राजधानी परियोजना का काम गति नहीं पकड़ सका। 2019 तक राजधानी की निर्माण के प्रथम चरण पर लगभग 50000 करोड़ रूपये की राशि खर्च की गई। इसी बीच राज्य विधान सभा के चुनाव सिर पर आ गए। नायडू और उनकी पार्टी के नेताओं को पूरा भरोसा था कि इन चुनावों वे फिर सत्ता में आएंगे। लेकिन ऐसा नहों हुआ। राज्य में वाई एस आर कांग्रेस सत्ता में आई तथा जगन मोहन रेड्डी राज्य के मुख्यमंत्री बने . उन्होंने आते ही राज्य की बनने वाली नई राजधानी परियोजना के काम को स्थगित कर दिया। उन्होंने कहा कि अब राज्य की एक नहीं बल्कि तीन राजधानियां बनेगी . ये स्थान अमरावती, कन्नूर और विशाखापतनम होंगे। राज्य विधान सभा में राज्य की राजधानी के लिए बनाये गए पुराने कानून को निरस्त कर एक नया कानून बनाया गया जिसमें तीन राजधानियां बनाये जाने का प्रावधान किया गया था। इस नए कानून को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। हाई कोर्ट ने इस कानून में कमियां बता कर रद्द कर दिया। राज्य सरकार ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जहाँ मामला लम्बे समय तक लंबित रहा। इसी बीच 2024 के विधान सभा चुनाव आ गए। इन चुनावों में तेलुगु देशम पार्टी और इसके गठबंधन को भारी जीत मिली। नायडू फिर राज्य के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने सत्ता संभालते ही घोषणा की कि राज्य की केवल एक ही राजधानी होगी और वह अमरावती होगी। विधान सभा में कानून बना कर इसे पुख्ता भी कर दिया गया। अमरावती में नई राजधानी के निर्माण का काम फिर से शुरू हो गया।उन्ही पुरानी कंपनियों के बुलाया जिन्होंने इस राजधानी के निर्माण की रिपोर्ट बनाई थी। केंद्र सरकार ने अपने बजट में बड़ी राशि का आवंटन इस परियोजना के लिए किया ताकि निर्माण कार्य शुरू होने कोई विलम्ब नहीं हो। नायडू सरकार की साख तथा नायडू के काम करने के तरीके को देखते हुए गूगल तथा इनफ़ोसिस जैसी बड़ी कंपनियों ने यहाँ ऑफिस खोलने का निर्णय किया। सरकार ने यहाँ पूँजी निवेश करने वालों को अनेक सुविधाएँ देने की घोषणा की जिसमें लगभग मुफ्त जमीन उपलब्ध करवाया जाना भी शामिल था। नायडू ने इस बात का भरोसा दिलाया कि अगले पांच साल में राज्य की नई राजधानी का पहला चरण पूरा हो जायेगा तथा राज्य सरकार यहाँ से राजधानी विधिवत काम करने लगेगी।
लेकिन नायडू को एक चिंता सता रही थी कि अगर 2029 के विधानसभा चुनावों के बाद राज्य में उनकी पार्टी फिर सत्ता में नहीं आई तथा आने वाली सरकार अमरावती को राजधानी बनाने के फैसला कहीं रद्द नहीं न कर दे। चूँकि केंद्र तथा राज्य में तेलुगु देशम पार्टी एनडीए का हिस्सा है इसलिये केंद्र सरककर से विचार विमर्श करके तय हुआ कि विधान सभा में एक प्रस्ताव पारित करके केंद्र सरकार से यह अनुरोध किया जाये कि राज्य के विभाजन करके दो राज्य बनाने के कानून में संशोधन कर के यह प्रावधान किया जाये कि आंध्र प्रदेश की राजधानी अमरावती ही होगी। हाल के संसद के बजट अधिवेशन में यह संशोधन पारित कर दिया। इसके अनुसार क्योंकि इसे केंद्रीय कानून दवारा बनाया गया है इसलिए राज्य सरकार इसमें परिवर्तन नहीं कर सकती। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)