पृथ्वी दिवस 22 अप्रैल पर विशेष
लेखक : अनुज प्रताप सिंह

लेखक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर, एमबीए और पर्यावरण मामलों के जानकार हैं।
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आज पृथ्वी दिवस है। यह तो सर्वविदित है कि ब्रह्मांड में धरती नामक एक ही ग्रह ऐसा है जहां जीवन है। उस पर वैश्विक तापमान और जलवायु परिवर्तन का जानलेवा असर अब साफ-साफ दिखाई देने लगा है। और अब यह भी साफ हो गया है कि मानवीय गतिविधियों के कारण ही धरती तप रही है। इसे संयुक्त राष्ट्र, उसकी विभिन्न ऐजेंसियों सहित दुनिया के शोध और अध्ययनों ने यह साबित भी कर दिया है। विकास और सुख-सुविधाओं की अंधी दौड़ में हम जाने-अनजाने अपनी धरती मां को काफी नुकसान पहुंचा रहे हैं। फिर हमारा मौजूदा विकास हमारी आबोहवा को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। उसके परिणाम स्वरूप हवा, पानी, जमीन और हमारा खान-पान तेजी से जहरीला होता चला जा रहा है। दरअसल हमने विकास का एक ऐसा माडल अपनाया है जिसने निरंकुश उपभोक्तावाद को बढ़ावा दिया है।सबसे बड़ी बात यह कि पेरिस समझौता समूची दुनिया को एक सूत्र में बांधे रखने में नाकाम रहा है। ऐसे हालात में यह मुमकिन नहीं है कि हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें।देखा जाये तो दूसरे औद्योगिक -रासायनिक कारणों को छोड़ भी दिया जाये तो धरती घरेलू उपकरणों से भी गर्म हो रही है। यह बेहद शोचनीय और चिंतनीय पहलू है। वह बात दीगर है कि देश में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपने प्रयासों से इस वसुंधरा को हरा-भरा बनाए रखने में जी-जान से जुटे हुए हैं और सरकार भी वृक्षारोपण के माध्यम से हरित क्षेत्र बढ़ाने के हर संभव प्रयास कर रही है। लेकिन हम फिर भी नहीं चेते हैं और सुख-सुविधाओं की खातिर उपभोग में कीर्तिमान बनाने की होड में लगे हुए हैं। जीवन को सुविधाजनक बनाने की खातिर उपकरणों की बढ़ती लालसा पर्यावरणीय संकट को और बढ़ा रही है। सच तो यह है कि जीवन को सुविधा जनक बनाने वाले घरेलू उपकरण भी धरती को गर्म करने में अहम योगदान दे रहे हैं। इसके लिए भी इंसान ही दोषी है। इसके दुष्परिणाम स्वरूप हर साल गर्मी रिकार्ड तोड़ रही है, ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जल संकट दिनोंदिन भयावह होता जा रहा है। असलियत यह है कि इससे जहां पर्यावरण गंभीर रूप से प्रभावित हो ही रहा है, वहीं हमारी सेहत भी भयावह रूप से प्रभावित हो रही है जिसके कारण इंसान जानलेवा बीमारियों का शिकार होकर मौत के मुंह में जाने को मजबूर है। ऐसे में हम उन घरेलू उपकरणों के बारे में जानकारी दे रहे हैं जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं और कुछ उन प्रयासों के बारे में बता रहे हैं जिन्हें धरती बचाने की दिशा में उठाया जा सकता है।
गर्मी के मौसम में हम ठंडे पानी के लिए फ्रिज, कमरे ठंडा रखने के लिए एयर कंडीशनर और साफ पानी के लिए आर ओ का इस्तेमाल करते हैं। आज के दौर में फ्रिज कमोबेश हर घर में पाया जाता है। फ्रिज में आर -134 ए नामक जिस रेफ्रिजरेंट्स का इस्तेमाल होता है, उसमें क्लोरोफ्लोरोकार्बन का उपयोग होता है। यह गैस ओजोन परत को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती है। जहांतक एयरकंडीशन का सवाल है, यह पर्यावरण के लिए तो खतरनाक है ही। अभी भी बाजार में पुराने आर-22 रेफ्रिजरेंट्स के एसी हैं जिनमें एचसीएफसी यानी हाइड्रो-क्लोरो फ्लोरो कार्बन का इस्तेमाल किया जाता है जो ग्लोबल वार्मिंग के लिए काफी खतरनाक है। लेकिन अब पर्यावरण को देखते हुए फ्रिज में 290 रेफ्रिजरेंट्स का इस्तेमाल किया जा रहा है जिसे ग्लोबल वार्मिंग को रोकने में मददगार बताया जा रहा है। वहीं नये एसी आर-401ए रेफ्रिजरेंट्स में एच एफ सी यानी हाइड्रो-फ्लोरो कार्बन का इस्तेमाल किया जा रहा है।
आर ओ को लें, इसके अंदर पानी साफ करने के लिए रिवर्स आस्मोसिस की प्रक्रिया अपनायी जाती है जिसके तहत 100 लीटर पानी से केवल 40 लीटर पानी ही साफ किया जा सकता है। शेष 60 लीटर पानी इस प्रक्रिया में बर्बाद हो जाता है। इस प्रक्रिया से पानी में जिंक की मात्रा पूरी तरह खत्म हो जाती है। नतीजतन हड्डियां कमजोर हो जाती हैं। घरों में इस्तेमाल होने वाले बिजली के स्विचों के आन रह जाने से एक महीने में कम से कम 30 से 40 यूनिट तक बिजली की बर्बादी होती है। बिजली विभाग के अधिकारी की मानें तो यह आंकड़ा एक घर का है। छोटे कस्बे,छोटे शहर और महानगरों के आंकड़ों के हालात की भयावहता का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। मान लीजिए किसी शहर में दो लाख बिजली उपभोक्ता हैं, हर दिन वह डेढ यूनिट बिजली बर्बाद करते हैं तो उस शहर में एक साल में तकरीब दस करोड से ज्यादा यूनिट बिजली बर्बाद हो जाती है। जहांतक लैपटाप का सवाल है, यह डेस्कटाप से अच्छा विकल्प है। यह डेस्कटाप के मुकाबले 5 गुना कम ई वेस्ट पैदा कर्ता है। विशेषज्ञों की मानें तो एक डेस्कटाप कंप्यूटर 160 से 200 वाट बिजली की खपत करता है। जबकि लैपटाप 20 से 50 वाट तक बिजली खाते हैं।
धरती बचाने की दिशा में प्रयास का सवाल है तो सबसे पहले प्लास्टिक को लें जो धरती पर प्रदूषण के मामले में सबसे बड़ी समस्या है। दुनियाभर के समुद्र प्लास्टिक कचरे की समस्या से जूझ रहे हैं। नतीजतन समुद्री जीवों का अस्तित्व खतरे में है। वैज्ञानिकों ने एक एंजाइम की खोज की है जो प्लास्टिक को पूरी तरह खत्म तो नहीं करता लेकिन कुछ ही दिनों में प्लास्टिक को सड़ा कर रिसाइकिल करने की स्थिति में पहुंचा देता है। दिल्ली की एक स्टार्टअप कंपनी द्वारा वायु प्रदूषण से निजात पाने की दिशा में एक 40 फीट लम्बा ऐसा एयर प्यूरीफायर बनाया है जो तीन किलोमीटर दायरे में रहने वाले तकरीबन 75 हजार लोगों को साफ हवा दे सकता है जिसकी क्षमता रोजाना 3.2 करोड़ क्यूबिक मीटर हवा साफ करने की है। दुनियाभर में 84 करोड़ लोग पीने के साफ पानी के लिए तरस रहे हैं। फाग कलेक्टर ऐसा फ्रेम है जो 74 किलोमीटर की रफ्तार से चलने वाली हवा को झेल सकता है। यह कोहरे को सोखकर पानी में बदल देता है। उस पानी को पाइपलाइन के जरिए घरों तक पहुंचाया जाता है। इसका इस्तेमाल आजकल सहारा मरुस्थल के आसपास मोरक्को के लोगों द्वारा किया जाता है। दुनियाभर में हर साल बाढ में लाखों लोगों को जान-माल का करोड़ों-करोड का नुकसान होता है।2017 में अमेरिका में आये हेरिकेन हर्वे नामक तूफान के बाद आयी बाढ से बचाने की दिशा में विशेषज्ञों द्वारा एक तैरने वाला घर बनाने की योजना बनायी है। गौरतलब है कि हमारे देश में हरसाल तीन करोड से ज्यादा लोग बाढ से बेघर होते हैं।
वैज्ञानिकों ने लम्बे शोध के बाद एक पारदर्शी सेल विकसित किया है जो सामान्य तौर पर दिखने वाला प्रकाश नहीं वरन इंन्फ्रारेड प्रकाश अवशोषित कर बिजली बनाता है। इससे ये मानव आंखों के लिए 66 फीसदी पारदर्शी बन जाते हैं। इसे घर की खिड़कियों पर लगाने से कम कीमत पर बिजली बनायी जा सकती है और कमरे में बैठा इंसान बाहर की चीजों को आसानी से देख सकता है। यह हमारे देश के लिए काफी उपयोगी है क्योंकि यहां आज भी तीन करोड से ज्यादा घरों में बिजली नहीं पहुंच सकी है। एक अनुमान के आधार पर दुनिया में तकरीबन साढे तीन लाख लोग जंगलों की आग में अपनी जान गंवा देते हैं। अमेरिका में जंगलों में आग लगने की समयावधि बढकर अब 78 दिन हो गयी है। विशेषज्ञों – वैज्ञानिकों का मानना है कि कम ज्वलनशील चीजों से घरों का निर्माण करके हरसाल होने वाली लाखों मौतों को बचाया जा सकता है। ये कुछ उपाय हैं जो धरती बचाने में कारगर हो सकते हैं। मेरा मानना है कि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में उपजी कठिन परिस्थितियों में आयी आपदाओं से ये प्रयास काफी हदतक राहत दे सकते हैं। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)