
पर्यटन नहीं, यह तो ‘फोटो-विहीन तपस्या’ है
लेखिका : रेणु जैन
इंदौर (मध्य प्रदेश)
www.daylifenews.in
कहते हैं कि आज का युग डिजिटल है। इंसान चाहे खाना खाए या न खाए, लेकिन फोटो जरूर खींचेगा। सुबह की चाय से लेकर रात की रजाई तक, हर चीज कैमरे के सामने प्रस्तुत की जाती है। ऐसे में यदि कोई यह फरमान सुना दे कि “विदेश यात्रा में एंड्रॉयड मोबाइल नहीं ले जा सकते”, तो यह खबर सुनकर आधुनिक पर्यटक का दिल उसी तरह टूट जाएगा जैसे बिना नेटवर्क के सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर का।आज विदेश यात्रा का उद्देश्य केवल नई जगहें देखना नहीं रह गया है। असली मकसद तो पड़ोसियों, रिश्तेदारों और सोशल मीडिया मित्रों को यह विश्वास दिलाना होता है कि “हम भी अंतरराष्ट्रीय स्तर के व्यक्ति हैं।” पहले लोग विदेश से ज्ञान, अनुभव और संस्कृति लेकर आते थे। अब लोग 5000 फोटो, 200 सेल्फी और 50 रील लेकर आते हैं। यात्रा का आनंद बाद में लिया जाता है, पहले उसकी ऑनलाइन घोषणा की जाती है।
कल्पना कीजिए, कोई व्यक्ति पेरिस पहुंच गया। सामने एफिल टॉवर खड़ा है, लेकिन मोबाइल नहीं है। वह बेचारा करेगा क्या? टॉवर को अपनी आंखों से देख लेगा, पर फिर मोहल्ले वालों को कैसे साबित करेगा कि वह सचमुच पेरिस गया था? आजकल आंखों देखा सच नहीं माना जाता, कैमरे में कैद सच ही अंतिम सत्य है। यदि फोटो नहीं है तो मानो यात्रा हुई ही नहीं। आधुनिक समाज में यादों से अधिक महत्व उनके डिजिटल प्रमाणों को दिया जाता है।
पुराने जमाने में लोग यात्रा से लौटकर किस्से सुनाते थे। वे बताते थे कि कौन-सी जगह सुंदर थी, किस देश के लोग कैसे थे और वहां की संस्कृति में क्या विशेष था। अब लोग किस्से नहीं सुनाते, सीधे मोबाइल निकालकर कहते हैं—“रुको, मैं फोटो दिखाता हूं।” फोटो देखकर ही लोगों को भरोसा आता है कि यात्रा वास्तव में हुई थी। वरना शंका बनी रहती है कि कहीं साहब बस बस-स्टैंड तक घूमकर तो नहीं आ गए।
यदि एंड्रॉयड मोबाइल विदेश में ले जाना बंद हो जाए, तो सबसे बड़ा संकट पर्यटन उद्योग पर नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर आएगा। फेसबुक की टाइमलाइन सूनी पड़ जाएगी, इंस्टाग्राम की रीलें उदास हो जाएंगी और व्हाट्सऐप स्टेटस अनाथ महसूस करने लगेगा। लाखों लोग विदेश से लौटकर यह सोचते रह जाएंगे कि अब अपनी उपलब्धि का प्रदर्शन किस माध्यम से करें। आखिर यात्रा का आनंद अकेले लेने से क्या फायदा, जब दुनिया को उसकी जानकारी ही न हो!
कुछ लोग तो विदेश जाने से पहले ही फोटो खिंचवाने का अभ्यास शुरू कर देते हैं। एयरपोर्ट पर एक फोटो, विमान की सीट पर दूसरी, विमान के खाने के साथ तीसरी और खिड़की से बादलों की चौथी। यात्रा कम होती है, फोटो-उत्सव ज्यादा। ऐसे लोगों से मोबाइल छीन लेना वैसा ही है जैसे किसी कवि से कलम, नेता से माइक या क्रिकेटर से बल्ला छीन लेना। उनके लिए कैमरा केवल उपकरण नहीं, बल्कि आत्म-अभिव्यक्ति का प्रमुख साधन बन चुका है।
आज स्थिति यह है कि कई पर्यटक किसी ऐतिहासिक इमारत को देखने से ज्यादा उसकी “परफेक्ट सेल्फी” लेने में रुचि रखते हैं। संग्रहालय में रखी दुर्लभ वस्तु की जानकारी पढ़ने के बजाय उसकी तस्वीर लेना अधिक जरूरी माना जाता है। समुद्र किनारे बैठकर लहरों का आनंद लेने के बजाय लोग यह सोचते हैं कि कौन-सा एंगल सबसे अधिक लाइक दिलाएगा। देखने और दिखाने के बीच का अंतर धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है।हो सकता है भविष्य में पर्यटन विभाग नया पैकेज निकाले—“मोबाइल-मुक्त विदेश यात्रा।” इसमें पर्यटक केवल स्थान देख सकेंगे, फोटो नहीं खींच सकेंगे। तब शायद उन्हें पहली बार पता चले कि एफिल टॉवर की ऊंचाई कितनी है, संग्रहालय में क्या रखा है और समुद्र का रंग वास्तव में कैसा दिखता है। क्योंकि अभी तक तो अधिकांश लोग स्क्रीन पर नजर रखते हुए दुनिया देखते हैं। संभव है कि ऐसी यात्रा उन्हें वास्तविक अनुभवों का महत्व भी समझा दे।
हालांकि यह भी सच है कि मोबाइल ने यात्रा को आसान बनाया है। नक्शे, अनुवाद, ऑनलाइन टिकट और तत्काल संपर्क जैसी सुविधाएं आज यात्रियों की बड़ी मदद करती हैं। लेकिन व्यंग्य का विषय यह है कि इन सुविधाओं से कहीं अधिक उत्साह फोटो और पोस्ट साझा करने को लेकर दिखाई देता है।
आखिर में यही कहा जा सकता है कि आज के दौर में विदेश यात्रा और मोबाइल का रिश्ता इतना गहरा हो चुका है कि दोनों को अलग करने की कल्पना भी खतरनाक है। आधुनिक पर्यटक के लिए विदेश जाना उतना महत्वपूर्ण नहीं, जितना विदेश जाकर उसकी तस्वीरें दिखाना। इसलिए यदि कोई कहे कि “विदेश जाओ, पर एंड्रॉयड मोबाइल मत ले जाओ”, तो यह सलाह नहीं, सीधे-सीधे डिजिटल युग के पर्यटकों के खिलाफ सबसे बड़ा व्यंग्य प्रतीत होती है। आखिर बिना फोटो के विदेश यात्रा का प्रमाण कौन देगा? आज की दुनिया में देखा हुआ नहीं, दिखाया हुआ ही सच माना जाता है! (लेखिका के अपने विचार हैं)