

प्रदेश कांग्रेस कमेटी में आरक्षण बचाओ प्रकोष्ठ नवगठित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी
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जयपुर। प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने आरक्षण बचाओ प्रकोष्ठ नवगठित किया जिसमें जस्साराम चौधरी को प्रथम चेयरमैन (प्रदेशाध्यक्ष) बनाया गया। जस्साराम चौधरी को पीसीसी के प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने कांग्रेस का दुपट्टा पहनाकर मीठा मुंह कराया। भविष्य में आरक्षण बचाओ प्रकोष्ठ की कार्यकारिणीं का विधिवत गठन करने की बात भी कही गई।
पीसीसी में संवाददाता सम्मलेन में जस्साराम चौधरी द्वारा यह बताया गया की इस प्रकोष्ठ आवश्यकता क्यों पड़ी। इस अवसर पर उन्होंने बताया कि राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी भारतीय संविधान में देश के कमजोर वर्गों अनुसूचित जाति, जनजाति और सामाजिक व आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को विकास की धारा में शामिल करने के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं जिसके तहत राजकीय सेवाओं व शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश के लिए आरक्षण के प्रावधान किए गए हैं। लेकिन देखने में आया है कि गत एक दशक से आरक्षण के अवसरों को निष्प्रभावी बनाने की नीयत से न केवल आरक्षण नियमों के साथ छेड़ छाड़ की जा रही है बल्कि इन वर्गों की न्याय संगत मांगों को भी अनदेखा किया जा रहा है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि :



- भारत सरकार में। AS ग्रेड के 63 अधिकारियों की लेटरल एंट्री के माध्यम से नियुक्ति में आरक्षित वर्गों को पूर्ण रूप से उपेक्षित किया गया है। अगस्त 2024 में UPSC ने बिना किसी आरक्षण के 45 और पदों का विज्ञापन जारी किया जिसका भारी विरोध होने पर वापस लेना पड़ा।
- वरिष्ठ पदों पर पदस्थापित करने में आरक्षित वर्गों के अधिकारियों की अनदेखी की गई है। वर्ष 2019 में 89 सचिवों में से 1 SC, 3ST और OBC शून्य तथा 85 अनारक्षित (UR) थे। केंद्रीय स्टाफिंग स्कीम के अंतर्गत सचिवों (322 अधिकारी) में वर्ष 2022 में 16 SC, 13 ST, 39 OBC और 254 सामान्य वर्ग के अधिकारी थे।
- राजस्थान के केंद्रीय एवं राज्य विश्वविद्यालयों में कुलपति के 30 पदों में से आरक्षित वर्ग के केवल तीन एवं प्रोफेसरों के आरक्षित पदों को NFS घोषित किया जाकर अनारक्षित श्रेणी में शामिल किया जा रहा है।
- हमारे राज्य में आरक्षण कानून के अनुसार राजकीय सेवाओं के विभिन्न संवर्गों के रोस्टर रजिस्टर का नियमानुसार संधारण नहीं किया जाकर, (विशेष तौर पर शिक्षा, स्वास्थ्य और चिकित्सा तथा ग्रामीण विकास व पंचायती राज विभाग द्वारा), नियमों का अनुपालन नहीं किया जा रहा है जिससे आरक्षित वर्गों के हज़ारों अभ्यर्थियों को वंचित रखा जा रहा है।
- वर्ष 2019 में EWS आरक्षण के बाद, नौकरियों में आरक्षण की कोई ऊपरी सीमा नहीं रह गई है। ऐसे में जनप्रतिनिधित्व में आरक्षण की 50% की सीमा पूर्ण रूप से असंगत है। अतः SC, ST, OBC को समानुपातिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
- चुनाव एवं नौकरियों में समानुपातिक प्रतिनिधित्व के लिए जाति एवं श्रेणी आधारित जनगणना की जाकर, जिसकी जितनी जनसंख्या हो उसकी उतनी भागीदारी की व्यवस्था सभी वर्गों के समावेशी विकास के लिए आवश्यक है।