फुटपाथ पर पहला हक पैदल यात्री का, कब्जेदारों का नहीं

लेखिका : रेणु जैन
इंदौर (मध्य प्रदेश)
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सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में यह स्पष्ट किया है कि सड़क किनारे बने फुटपाथ केवल सीमेंट और पत्थर की संरचना नहीं हैं, बल्कि नागरिकों के सुरक्षित आवागमन से जुड़े मौलिक अधिकार का हिस्सा हैं। यह निर्णय केवल कानूनी व्याख्या नहीं, बल्कि उन करोड़ों लोगों की आवाज है जो रोज़ अपने गंतव्य तक पैदल पहुँचने के लिए संघर्ष करते हैं। जब सड़क पर सबसे पहले पैदल चलने वाले का अधिकार माना गया है, तब शहरों में फुटपाथों का निर्माण और उनका संरक्षण सरकारों की प्राथमिक जिम्मेदारी बन जाता है।
दुर्भाग्य से इंदौर जैसे देश के सबसे स्वच्छ शहर में भी फुटपाथों की स्थिति संतोषजनक नहीं है। कहीं उन पर स्थायी और अस्थायी अतिक्रमण है, कहीं दुकानों का सामान फैला हुआ है, तो कहीं वाहनों की पार्किंग ने पैदल यात्रियों का रास्ता रोक रखा है। नतीजा यह होता है कि लोगों को मजबूर होकर सड़क पर चलना पड़ता है, जहाँ हर पल दुर्घटना का खतरा बना रहता है। सबसे अधिक परेशानी बुजुर्गों, महिलाओं, बच्चों और दिव्यांगजनों को होती है।
विडंबना यह है कि करोड़ों रुपये खर्च कर फुटपाथ बनाए जाते हैं, लेकिन उनके वास्तविक उपयोग की निगरानी नहीं होती। नगर निगम और यातायात पुलिस समय-समय पर अभियान तो चलाते हैं, पर कुछ दिनों बाद स्थिति फिर पहले जैसी हो जाती है। यह समस्या केवल अतिक्रमण की नहीं, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति की भी है।
यदि शहर को वास्तव में स्मार्ट और सुरक्षित बनाना है तो फुटपाथों को अतिक्रमण और अवैध पार्किंग से पूरी तरह मुक्त करना होगा। जहाँ फुटपाथ नहीं हैं, वहाँ उनका निर्माण अनिवार्य किया जाए। नए सड़क निर्माण की प्रत्येक परियोजना में पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित और बाधारहित फुटपाथ अनिवार्य शर्त हो। साथ ही, फुटपाथ पर कब्जा करने वालों के विरुद्ध नियमित और कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
इंदौर को केवल स्वच्छता में ही नहीं, बल्कि पैदल यात्रियों के अधिकारों की रक्षा में भी देश के लिए उदाहरण बनना चाहिए। विकास का अर्थ केवल चौड़ी सड़कें और ऊँचे फ्लाईओवर नहीं, बल्कि ऐसा शहर भी है जहाँ एक बच्चा, एक बुजुर्ग और एक दिव्यांग व्यक्ति बिना भय के सुरक्षित पैदल चल सके।
सुप्रीम कोर्ट का संदेश स्पष्ट है—फुटपाथ जनता के हैं, उन पर पहला और अंतिम अधिकार पैदल यात्री का है। अब प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और नागरिकों की जिम्मेदारी है कि इस अधिकार को कागज़ों से निकालकर ज़मीन पर उतारें। जब तक फुटपाथ पैदल यात्रियों को नहीं मिलेंगे, तब तक सुरक्षित और संवेदनशील शहर का सपना अधूरा ही रहेगा। (लेखिका के अपने विचार हैं)

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