
विजयदत्त श्रीधर
-संस्थापक, ज्ञानतीर्थ सप्रे संग्रहालय
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हिन्दी-जीवनव्रती श्री कैलाशचन्द्र पंत अब हमारे बीच नहीं हैं। 31 जुलाई, 2026 को वे ब्रह्मलीन हुए। दादा के संबोधन से देशभर में लोकप्रिय पंत जी मध्यप्रदेश के सार्वजनिक जीवन की ऐसी विभूति थे जिन्हें हर वर्ग और हर आयु के लोगों का आदर और विश्वास मिला। अनन्य हिन्दी सेवा के लिए श्री कैलाशचन्द्र पंत को वर्ष 2026 के पद्मश्री अलंकरण से विभूषित किया गया । सबको एहसास हुआ कि सर्वथा सुपात्र समाजसेवी की सुदीर्घ साधना को सम्मानित किया गया है।
श्री कैलाशचन्द्र पंत ने मध्यप्रदेश में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के ध्वज तले सेवा और सरोकार का जो समीकरण रचा, उसका सबसे उल्लेखनीय तथ्य है कि हिन्दी-सेवा के लिए दादा कैलाशचन्द्र पंत ने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व में अंतर्निहित तीन बड़ी संभावनाओं का लगभग परित्याग कर दिया। साठ के दशक में मेधावी छात्र के रूप में स्नातकोत्तर उपाधि अर्जित करने वाले पंत जी, किसी भी विश्वविद्यालय में सफल प्राध्यापक हो सकते थे। उनकी भाषा और शैली, तथ्य-निरूपण और कथ्य-कला पंत जी को पत्रकार जगत में प्रतिष्ठित करने में समर्थ होती। उनका लिखा हुआ गद्य जिन्होंने पढ़ा है वे निस्संकोच स्वीकार करेंगे कि श्री कैलाशचन्द्र पंत हिन्दी के समर्थ निबंधकार होते। किंतु यह उनकी वैयक्तिक उपलब्धि होती। पंत जी ने अपने व्यष्ठि के स्थान पर समष्ठि को वरीयता दी। उन्होंने आजीवन हिन्दी सेवा का व्रत लिया। इस व्रत का परिपालन करने में दादा का जो गुण आधारभूत सिद्ध हुआ, वह है लोकसंग्रह की उनकी उदात्त प्रकृति। इसी गुण के कारण वे अपने चहुँओर और दूर-दूर तक एक वृहद परिवार रच सके।
जब शिक्षा आधुनिक नहीं हुई थी, तब स्कूल में पढ़ा था- “तरुवर फल नहिं खात हैं, सरुवर पियहिं न पान” अर्थात् वृक्ष अपने फल खुद नहीं खाते (दूसरों को खाने के लिए फल देते हैं), सरोवर (जल स्रोत) स्वयं अपना पानी नहीं पीते अर्थात् उनमें प्रवहमान और संचित जल दूसरों की प्यास बुझाने के लिए होता है। मानव जीवन में भी कतिपय ऐसे सज्जन होते हैं जो अपने आचार-विचार और व्यवहार से समस्त समाज के हो जाते हैं। उनके सोच के दायरे में सबका कल्याण समाहित होता है। भोपाल के सांस्कृतिक परिदृश्य में ऐसा ही एक नाम दादा कैलाशचन्द्र पंत का है। वे अजातशत्रु थे । इसीलिए सब उनके थे और वे सबके थे।
दादा के परिवार में घुले-मिले इन 50 सालों में उनके बहुविध स्वरूपों का साक्षात्कार हुआ। सन् 1977 में दादा कैलाशचन्द्र पंत ने साप्ताहिक’ जनधर्म’ का सम्पादन-प्रकाशन आरम्भ किया। ‘जनधर्म’ के कई विशेषांक उन्होंने निकाले, जो सन्दर्भ की दृष्टि से स्थाई महत्त्व के हैं। ‘जनधर्म’ ने मध्यप्रदेश के किसी श्रेष्ठ साहित्यकार को प्रतिवर्ष ‘सारस्वत सम्मान’ से अलंकृत करने की परम्परा आरम्भ की थी।
अपने गुरु श्री बैजनाथप्रसाद दुबे के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में दादा कैलाशचन्द्र पंत ने मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिन्दी भवन न्यास, भोपाल के मंत्री- संचालक का दायित्व जिस लगन, कल्पनाशीलता और समर्पण के साथ निभाया, उसने हिन्दी भवन को हिन्दी और संस्कृति विषयक गतिविधियों में देश की अग्रणी संस्थाओं में प्रतिष्ठित किया है।
जनसंपर्क मध्यप्रदेश ने श्री कैलाशचन्द्र पंत को ‘गणेशशंकर विद्यार्थी ‘ सम्मान से पुरस्कृत किया। विश्व हिन्दी सम्मेलन में दादा को ‘हिन्दी सेवी सम्मान’ प्रदान किया गया। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान का ‘सुब्रमण्यम् भारतीय सम्मान’ उन्हें मिला। सप्रे संग्रहालय के ‘लाल बलदेव सिंह सम्मान’ और शताब्दी समारोह में ‘कर्मवीर सम्मान’ से उन्हें सम्मानित किया गया।
निश्चय ही दादा कैलाशचन्द्र पंत जैसा विशाल स्नेही परिवार मध्यप्रदेश में कोई और नहीं रच पाया। इसी का प्रतिफल है कि समाज ने पंत जी को मान-सम्मान और अपनापन देने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। (लेखक के अपने विचार हैं।)