
लेखक : ज्ञानेन्द्र रावत
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।
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नेपाल त्रासदी ने हिमालय को, उसके मूल चरित्र को बूझने – समझने का हमें फिर एक अवसर प्रदान किया है। जबकि बीते दशकों की घटनायें हमें बार-बार सचेत करती रही हैं। नेपाल में आयी आपदा के खतरे की चेतावनी भी करीब पांच महीने पहले इंटरनेशनल सेंटर फार इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट ने मार्च 2026 में जारी अपनी रिपोर्ट के जरिए दी थी। लेकिन दुखद है कि बार-बार दी जा रही चेतावनियों को हम नजरंदाज करते रहे हैं। यह भी कि बीते दशकों की घटनाओं से हमने न तो कोई सबक सीखा और न उनसे निबटने की बाबत कोई कारगर प्रयास ही किये। नेपाल की घटना ने यह साफ कर दिया है कि इस इलाके में भूस्खलन और जलवायु जैसे जोखिम लगातार बढ़ रहे हैं। ग्लेशियर और ग्लेशियर झीलों के फटने का खतरा भी लगातार बढ़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन संस्था के कार्यकारी सचिव साइमन स्टील का कहना है कि जलवायु परिवर्तन से ऐसी आपदाओं की आशंका, आवृत्ति और घातकता काफी बढ़ जाती है। इसके साथ हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पूरा हिमालयी अंचल अपनी बनावट और प्राकृतिक विशेषताओं के चलते स्वाभाविक रूप से आपदाओं के प्रति काफी संवेदनशील है। यह दुनिया की सबसे नयी पर्वत श्रृंखला है जिसकी चट्टानें और मिट्टी पूरी तरह जमी और कठोर नहीं है जिसके कारण इस इलाके में मामूली हलचल से ही भू – स्खलन हो जाना आम बात है। यहां के पहाड़ और ढलान बहुत ही तेज, तीखे और सीधे हैं जिसकी वजह से बर्फबारी या बारिश के दौरान पहाड़ी मिट्टी और चट्टानें तेजी से नीचे गिरती हैं। इससे ग्लेशियर फटने का खतरा हर समय बना रहता है। इसकी इसी खासियत और ऊंचाई की वजह से इस इलाके में बारिश भी खूब होती है जो बाढ़ का सबसे बड़ा कारण बनती है। इसका एक अहम कारण यह भी है कि इंडियन टैक्टोनिक प्लेट लगातार उत्तर की ओर खासकर यूरेनियम प्लेट से टकरा रही है जिसके निरंतर टकराव की वजह से भूमि के भीतर भारी तनाव पैदा होता है।

हिमालयी अंचल मे घटती वन छतरी भी पहाड़ों के दरकने की अहम वजह है। इसका खुलासा एनआईटी राउरकेला के हालिया अध्ययन से हुआ है।अध्ययनकर्ता वैज्ञानिकों की मानें तो पेड़ों की कटाई, पहाड़ों पर बेतहाशा बढ़ता जा रहा निर्माण और जलवायु परिवर्तन वन छतरी घटने की प्रमुख वजह है। क्योकि वन छतरी यानी पेड़ों की पत्तियों , टहनियों और शाखाओं से जमीन के ऊपर बनी प्राकृतिक परत बारिश की बूंदों की जमीन पर सीधी मार को कम करती है। इनके न होने से बारिश की बूंदों की सीधी मार जमीन पर गिरती है जिससे ढलान की मिट्टी में पानी और जल दबाव बढ़ जाता है। वन छतरी जहां बारिश की जमीन पर पड़ने वाली मार को कम करती है, पानी के बहाव को नियंत्रित करती है और वहीं वह पेड़ों की जड़ों के जरिये मिट्टी को बांधे रखती है। वन छतरी के अभाव में भूस्खलन और भूधंसाव की संभावना तेजी से बढ़ती है।

फिर बढ़ते तापमान, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियरों का जहां तक सवाल है, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की हालिया रिपोर्ट की मानें तो दुनिया ग्लोबल वार्मिंग की 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार करने के खतरनाक स्तर के करीब पहुंच रही है। दक्षिण एशिया ग्लोबल वार्मिंग का सबसे अधिक शिकार बन रहा है। फिर जलवायु परिवर्तन का असर हिमालयी इलाकों में खुलकर सामने आने लगा है। प्रदूषण की मार से हिमालय का श्वेत शिखर श्याम हो रहा है। हकीकत यह है कि चांदी की तरह चमकती हिमालय की वो चोटियां… जिन्हें देखकर हर हिंदुस्तानी का सिर फख्र से ऊंचा हो जाता है, वे अब धीरे-धीरे काली पड़ रही हैं। इसके पीछे वाहनों की बढ़ती आपाधापी प्रमुख है। इसमें मैदानी तरक्की के धुंध की भी अहम भूमिका है जो दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वत की वादियों में जहर घोल रहा है। इसका खुलासा नासा के वैज्ञानिकों ने बीते 25 वर्षों के सैटेलाइट डाटा के अध्ययन के बाद किया है। ‘जर्नल आफ अर्थ सिस्टम साइंस’ में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया है कि यदि वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी नहीं की गयी तो इस सदी के अंत तक हिमालयी क्षेत्र अपनी मौसमी बर्फ का बहुत बड़ा हिस्सा खो देगा। सदी के अंत तक कई हिमालयी इलाकों से बर्फ लगभग गायब हो सकती है। यह हिमालयी अंचल में तेजी से बदल रहे मौसम के मिजाज का सबूत है। मौसम में आ रहा यह बदलाव ग्लेशियरों के पिघलने की दर को गहराई से प्रभावित कर रहा है। इसके कारण हिमालयी क्रायोस्फीयर कहें या बर्फीला तंत्र पहले से अधिक संवेदनशील होता जा रहा है। नतीजतन हिमालयी ग्लेशियर तेजी से बर्बाद हो रहे हैं।

असलियत में बढ़ते तापमान से हिमालय पिघल रहा है। यह भी सच है कि दक्षिणी और उत्तरी ध्रुवों के बाद सबसे अधिक बर्फ हिमालय में ही पायी जाती है। इसे धरती का तीसरा ध्रुव भी कहते हैं। हिमालय के तकरीबन 60 हजार से भी अधिक ग्लेशियर एशिया की दस बड़ी नदियों और सैकड़ों सहायक नदियों के स्रोत हैं। इन पर भारत, पाकिस्तान, नेपाल, चीन,भूटान, बांग्लादेश, हिंदचीन और मध्य ऐशिया के करीब दो अरब लोगों का जीवन यानी भोजन, पानी और ऊर्जा पर आधारित है। इन ग्लेशियरों का करीब-करीब तीन चौथाई हिस्सा समुद्र तल से मात्र 4500 से लेकर 6000 मीटर की ऊंचाई पर हैं। यही वजह है जिसके चलते बढ़ते तापमान का असर सबसे पहले इन्हीं ग्लेशियरों पर पड़ता है। विश्व हिमनद निगरानी सेवा की रिपोर्ट के अनुसार पिछले दशकों में ग्लेशियरों के पिघलने की दर में काफी तेजी आई है। वे चार गुणा तेजी से पिघल रहे हैं। वैज्ञानिक लीवेन टाइलिजे कहते हैं कि यह नुकसान केवल पहाड़ और तेजी से बर्फ पिघलने का नहीं है , अस्थिर भूभाग के निर्माण, खतरनाक ग्लेशियर झीलों के उभरने, बढ़ने और उनके फटने से आयी बाढ़ की तबाही का खतरा सबसे ज्यादा है। सच यह है कि ग्लेशियर झीलें हिमालयी क्षेत्र के लिए बहुत बड़ी चुनौती हैं जो दिन-ब-दिन अपना आकार बढ़ा रही हैं। इसके चलते बनी झीलें तबाही का सबब बन गयी हैं। इसरो के सैटेलाइट अध्ययन के अनुसार 2431 बड़ी झीलें चिन्हित की गयी हैं जिनका आकार 10 हैक्टेयर से अधिक है। इनमें से 676 का आकार 27 फीसदी से भी अधिक बड़ा है। इनमें 130 सर्वाधिक संवेदनशील हैं। इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एण्ड टेक्नालॉजी आस्ट्रिया और वाडिया हिमालयन भूविज्ञान संस्थान के हालिया अध्ययन के अनुसार हिमालयी क्षेत्र में वर्तमान में 24,440 ग्लेशियर झीलें हैं जिनमें 221 बेहद संवेदनशील और खतरनाक हैं जो कभी भी बम की तरह फट सकती हैं। इससे होने वाली तबाही की आशंका ने चिंता को बढ़ा दिया है।
निष्कर्ष यह कि नेपाल की हालिया त्रासदी ने न केवल ग्लेशियरों की निगरानी पर ही सवाल खड़े नहीं किये हैं, उसने चेतावनी तंत्र पर भी सवाल खड़े किये हैं। इस त्रासदी ने हिमालयी अंचल के देशों यथा- भारत, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, पाकिस्तान, चीन और म्यांमार सहित हिमालयी भारतीप राज्यों की चिंताओं को और बड़ा दिया है। असल में हिमालय में ग्लेशियरों की निगरानी पर्याप्त नहीं है। यहां निगरानी किये जा रहे 38 ग्लेशियरों में से केवल सात ही विश्व निगरानी सेवा के मानकों पर खरा उतरे हैं। जबकि कराकोरम, सिक्किम, जंस्कार व भूटान जैसे क्षेत्रों में ग्लेशियरों की निगरानी की बड़ी भारी कमी है।गौरतलब है कि पूरे अगस्त महीने में ही हिमालय 130 बार डोला है। यह खतरनाक संकेत है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हिमालय सक्रिय प्लेट सीमा पर है, इसलिए लगातार निगरानी और भूकंप रोधी निर्माण बेहद जरूरी है। असलियत में वह चाहे बाढ़ हो, हिमस्खलन हो, भूकंप हो, सबके अलग-अलग निगरानी तंत्र होने से उनमें तालमेल का पूरी तरह अभाव है। जबकि भूस्खलन, भूकंप, हिमस्खलन, ग्लेशियर का टूटना ये सब पहाड़ के खतरे हैं। इसलिए निगरानी हेतु एक यूनीफाइड सिस्टम की जरूरत है जिसमें जमीन पर और इस तरह के काम करने वालों की संयुक्त टीम हो जो चौबीसौ घंटे अपने काम को अंजाम दे। फिर इस तरह के अचानक होने वाले खतरों के लिए पारंपरिक चेतावनी प्रणाली की क्षमता बेहद सीमित होती है।
निष्कर्ष साफ है कि हिमालयी अंचल में आपदा प्रबंधन की रणनीति केवल चेतावनी प्रणाली पर निर्भर नहीं रह सकती। इस हिमालयी क्षेत्र में केवल चेतावनी प्रणाली पर निर्भर रहने के बजाय भूमि उपयोग पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किए जाने, विकास की अवधारणा को फिर से परिभाषित करने, इस अंचल में बुनियादी ढांचे का विकास पारिस्थितिकी की कीमत पर नहीं किये जाने की बेहद जरूरत है। यही नहीं नेपाल त्रासदी को हमें केवल एक आपदा के रूप में नहीं ,बल्कि एक सामरिक, वैज्ञानिक और मानवीय चुनौती के रूप में देखने की जरूरत है। यह सब पर्यावरण संवेदनशीलता के सही मायने में समन्वय से ही संभव होगा। उसी स्थिति में हम मानवजनित ऐसी आपदाओं के भंवर से बाहर निकलने और अपने भाल हिमालय को बचा पाने में समर्थ हो पायेंगे। (लेखक के अपने विचार हैं)