
लेखक : आदिवासी ताऊ
Online Herbalist, Homeopath, Counselor, Writer & Director.
निरोगधाम: मूंडियारामसर, सिरसी-बेगस रोड, जयपुर, राजस्थान।
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[पेट की बढ़ती चर्बी से शुरू हुई फैटी लीवर की समस्या को समय रहते नहीं संभाला तो यह लीवर में सूजन, फाइब्रोसिस और सिरोसिस जैसी गंभीर स्थिति तक पहुंच सकती है।]
आजकल अल्ट्रासाउंड में फैटी लीवर निकलना बहुत आम हो गया है। चिंता की बात यह है कि आम समस्या समझकर बहुत से लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते। इसमें अक्सर दर्द या कोई स्पष्ट परेशानी नहीं होती, इसलिए बहुत से लोग इसे बीमारी मानते ही नहीं। जबकि लीवर में लगातार बढ़ती चर्बी कुछ लोगों में सूजन और फिर Fibrosis यानी लीवर के स्वस्थ ऊतकों में सख्त दाग बनने की प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकती है। यदि समय रहते इसके कारणों पर ध्यान दिया जाए तो शुरुआती फैटी लीवर में बहुत अच्छा सुधार संभव है।
1-फैटी लीवर आखिर होता क्या है:
जब लीवर की कोशिकाओं में जरूरत से ज्यादा चर्बी जमा होने लगती है तो इसे Fatty Liver यानी लीवर में असामान्य रूप से चर्बी जमा होना कहते हैं। मोटापा, डायबिटीज, बढ़े ट्राइग्लिसराइड्स, असामान्य कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर जैसी शरीर में शुगर और वसा के संतुलन से जुड़ी गड़बड़ियों के साथ होने वाले फैटी लीवर को अब MASLD यानी शरीर की बिगड़ी चयापचय व्यवस्था से जुड़ा फैटी लीवर कहा जाता है। शराब का अधिक सेवन भी लीवर में चर्बी जमा होने और उसे नुकसान पहुंचने का बड़ा कारण है।
2-हमारी कौनसी असावधानियां इसे बढ़ा रही हैं:
शरीर की जरूरत से ज्यादा कैलोरी लेना और उसके मुकाबले शारीरिक मेहनत कम करना फैटी लीवर के प्रमुख कारणों में है। पेट का मोटापा, बार-बार मिठाई, मीठे पेय, ज्यादा चीनी, मैदा, बेकरी और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड यानी बहुत ज्यादा फैक्टरी में तैयार और पैकेटबंद खाद्य पदार्थए तली हुई चीजें, ज्यादा संतृप्त वसा और शारीरिक निष्क्रियता Insulin Resistance यानी ऐसी स्थिति को बढ़ाती हैं, जिसमें इंसुलिन शरीर में ठीक से काम नहीं कर पाता। इससे खून में शुगर और वसा का संतुलन बिगड़ता है और लीवर में चर्बी जमा होने लगती है। डायबिटीज, बढ़े ट्राइग्लिसराइड्स, असामान्य कोलेस्ट्रॉल और मोटापा इस खतरे को और बढ़ाते हैं।
3-लक्षण नहीं होना सुरक्षा की गारंटी नहीं है:
फैटी लीवर अक्सर चुपचाप बढ़ता रहता है। बहुत से लोगों को कोई खास परेशानी नहीं होती। कुछ लोगों में थकान या पेट के दायीं ओर ऊपरी हिस्से में भारीपन या बेचैनी रह सकती है। इसलिए केवल शरीर के संकेतों का इंतजार करना ठीक नहीं है। कई बार किसी दूसरी वजह से कराए गए अल्ट्रासाउंड या जांच में इसका पता चलता है।
4-अनदेखी की कीमत कितनी गंभीर हो सकती है:
फैटी लीवर आगे बढ़कर MASH यानी लीवर में चर्बी के साथ सूजन और कोशिकाओं को नुकसान होने की अवस्था में बदल सकता है। इसके बाद Fibrosis और फिर Cirrhosis यानी लीवर का गंभीर रूप से स्थायी दागदार और सख्त हो जाना शुरू हो सकता है। बीमारी बहुत आगे बढ़ने पर लीवर फेल होने और लीवर कैंसर का खतरा भी बढ़ता है। फैटी लीवर का खतरा केवल लीवर तक सीमित नहीं है। इससे पीड़ित लोगों में टाइप-2 डायबिटीज और हृदय रोग का खतरा भी अधिक रहता है।
5-कौनसी जांच जरूरी हो सकती हैं:
अल्ट्रासाउंड से लीवर में चर्बी का पता चल सकता है, लेकिन केवल “Grade 1, 2 या 3” देखकर बीमारी की पूरी गंभीरता तय नहीं होती। जरूरत के अनुसार Liver Function Tests यानी लीवर के कामकाज से जुड़ी खून की जांचें, ब्लड शुगर, HbA1c यानी Glycated Hemoglobin, जो पिछले लगभग तीन महीनों की औसत ब्लड शुगर बताता है, Lipid Profile यानी खून में कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स की जांच तथा CBC यानी Complete Blood Count, जिसमें प्लेटलेट सहित खून की प्रमुख कोशिकाओं की जानकारी मिलती है, उपयोगी रहती हैं। डॉक्टर उम्र, AST यानी Aspartate Aminotransferase और ALT यानी Alanine Aminotransferase, जो लीवर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचने पर खून में बढ़ने वाले प्रमुख एंजाइम हैं, तथा प्लेटलेट के आधार पर FIB-4 यानी लीवर में फाइब्रोसिस का खतरा जानने वाले स्कोर से आगे की जांच की जरूरत का अंदाजा लगा सकते हैं। खतरा अधिक मिलने पर FibroScan यानी लीवर की कठोरता मापने वाली जांच उपयोगी होती है।
6-फैटी लीवर से निकलने का सबसे मजबूत रास्ता:
यदि वजन अधिक है तो उसे कम करना उपचार का मुख्य आधार है। शरीर का लगभग 5 प्रतिशत वजन कम करने से लीवर में जमा चर्बी में सुधार शुरू हो सकता है, जबकि 7-10 प्रतिशत या उससे अधिक वजन घटाना लीवर की सूजन और फाइब्रोसिस में अधिक सुधार से जुड़ा है। सप्ताह में कम से कम लगभग 150 मिनट तेज चाल से चलना, साइकिल चलाना, व्यायाम करना या अपनी क्षमता के अनुसार दूसरी नियमित शारीरिक गतिविधि करें। लंबे समय तक लगातार बैठे रहने की आदत तोड़ें।
खानपान में हरी और दूसरी मौसमी सब्जियां, बिना छना गेहूं या गेहूं-जौ का आटा, मूंग-मसूर जैसी दालें, अमरूद, संतरा, पपीता और सेब जैसे साबुत फल तथा थोड़ी मात्रा में बादाम, अखरोट, अलसी या कद्दू के बीज शामिल करें। मिठाई, चीनी, मीठे पेय, पैकेटबंद जूस, मैदा, बेकरी और तली हुई चीजें कम करें तथा शरीर की जरूरत से ज्यादा भोजन करने से बचें। शराब से जुड़े फैटी लीवर में शराब छोड़ना सबसे महत्वपूर्ण कदम है। डायबिटीज, ट्राइग्लिसराइड्स, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर को भी नियंत्रित रखना जरूरी है।
7-देसी जड़ी-बूटियों की भूमिका:
(1) कालमेघ: परंपरागत रूप से लीवर और पाचन संबंधी समस्याओं में इसका उपयोग होता आया है।
(2) पुनर्नवा: परंपरागत चिकित्सा में लीवर तथा शरीर में सूजन और द्रव रुकने जैसी स्थितियों में इसका उपयोग किया जाता रहा है।
(3) आंवला: इसमें Polyphenols यानी पौधों में पाए जाने वाले लाभकारी प्राकृतिक तत्व और Antioxidants यानी शरीर की कोशिकाओं को नुकसान से बचाने वाले प्राकृतिक तत्व पाए जाते हैं। यह शरीर में शुगर और वसा के स्वस्थ संतुलन के लिए उपयोगी आहार का हिस्सा बन सकता है।
(4) हल्दी: इसमें मौजूद Curcumin यानी हल्दी का प्रमुख सक्रिय तत्व शरीर में सूजन और Oxidative Stress यानी शरीर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने वाली प्रक्रिया पर इसके प्रभावों को लेकर शोध का विषय रहा है।
(5) भृंगराज: परंपरागत रूप से लीवर संबंधी समस्याओं में उपयोग की जाने वाली प्रमुख वनौषधियों में शामिल है।
8-होम्योपैथी में चयन बीमारी के नाम से नहीं, लक्षणों से होता है:
(1) Chelidonium: दायीं ओर ऊपरी पेट में भारीपन या दर्द तथा भोजन और पाचन से जुड़े इसके विशेष लक्षण मिलने पर इसका चयन किया जाता है।
(2) Lycopodium: पेट फूलना, गैस, थोड़ा भोजन करने पर ही पेट भरा लगना और पाचन संबंधी इसके विशेष लक्षण मिलने पर इसका चयन किया जाता है।
(3) Nux Vomica: अनियमित खानपान, कब्ज, एसिडिटी और पाचन संबंधी इसके विशेष लक्षणों का मेल होने पर इसका चयन किया जाता है।
(4) Carduus Marianus: लीवर और पित्त से जुड़ी परेशानियों के साथ इसके विशेष लक्षण मिलने पर होम्योपैथी में इसका चयन किया जाता है।
(5) Phosphorus: लीवर संबंधी परेशानी के साथ इसके विशेष शारीरिक और मानसिक लक्षणों का मेल होने पर इसका चयन किया जाता है।
होम्योपैथिक दवा का सही चयन बीमारी के केवल नाम से नहीं, बल्कि मरीज के पूरे लक्षण-समूह के आधार पर किया जाता है।
फैटी लीवर में केवल रिपोर्ट देखकर घबराने की जरूरत नहीं, लेकिन इसे वर्षों तक अनदेखा करना भी ठीक नहीं है। पेट और शरीर का अतिरिक्त वजन घटाना, मीठा-मैदा और जरूरत से ज्यादा कैलोरी कम करना, नियमित व्यायाम करना तथा डायबिटीज, बढ़े ट्राइग्लिसराइड्स, असामान्य कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखना लीवर को बचाने की असली बुनियाद है। मैं फैटी लीवर के लिए कोई रेडीमेड उत्पाद नहीं देता। मरीज की डिटेल केस हिस्ट्री लेकर उचित उपचार और जीवनशैली संबंधी मार्गदर्शन किया जाता है। मेरी सेवा केवल ऑनलाइन है और लंबी वेटिंग रहती है। जो मरीज धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा कर लेते हैं, उनकी सेवा अवश्य की जाती है। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)